Uttarakhand: हरेला पर्व के अवसर पर सीएम धामी ने किया पौधरोपण

Uttarakhand: हरेला उत्तराखंड और हिमालयी क्षेत्रों में मनाया जाने वाला एक पारंपरिक त्योहार है, जो हरियाली, पर्यावरण संरक्षण और कृषि से जुड़ी परंपराओं को समर्पित होता है। यह पर्व मुख्य रूप से श्रावण मास की संक्रांति 16 या 17 जुलाई को मनाया जाता है, और 2025 में यह पर्व आज बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा हैं।

‘हरेला’ शब्द का अर्थ होता है “हरियाली”। यह पर्व वर्षा ऋतु के आगमन और धरती की उपजाऊ शक्ति का प्रतीक है। किसानों के लिए यह नई फसल की शुरुआत का संकेत है, जबकि पर्यावरण प्रेमियों के लिए यह हरियाली और वृक्षारोपण का संदेश देता है। यह पर्व प्रकृति के प्रति उत्तराखंड की आस्था और कृतज्ञता को दर्शाता है।

सीएम धामी ने शुभकामनाएं देते हुए कहा कि “प्रदेशवासियों को लोकपर्व हरेला की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं। हरेला केवल एक लोकपर्व नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति हमारी आस्था, पर्यावरण संरक्षण के संकल्प और आने वाली पीढ़ियों के लिए हरित भविष्य के निर्माण का प्रतीक है। यह पर्व हमें जल, जंगल, जमीन के संरक्षण तथा आने वाली पीढ़ियों के लिए हरित और समृद्ध भविष्य के निर्माण का संकल्प लेने की प्रेरणा देता है। यह पावन पर्व आप सभी के जीवन में सुख, समृद्धि, उत्तम स्वास्थ्य, खुशहाली और नई ऊर्जा का संचार करें, मेरी यही कामना है।

उन्होंने कहा कि आइए, इस शुभ अवसर पर एक पौधा अवश्य लगाएं, उसके संरक्षण का संकल्प लें और हरित, स्वच्छ एवं समृद्ध उत्तराखण्ड के निर्माण में अपनी सहभागिता सुनिश्चित करें।

हरेला पर्व की शुरुआत श्रावण संक्रांति से 9 या 10 दिन पहले होती है, जब लोग घरों में मिट्टी के पात्रों में गेहूं, जौ, मक्का या सरसों के बीज बोते हैं। संक्रांति के दिन इन अंकुरों (जिसे “हरेले” कहा जाता है) को काटा जाता है और बड़ों के आशीर्वाद के रूप में परिवार के सभी सदस्यों को सिर पर रखा जाता है।

पर्व के दिन बच्चे बड़े-बुज़ुर्गों से आशीर्वाद लेते हैं। घरों में पारंपरिक पकवान बनाए जाते हैं। कई स्थानों पर सांस्कृतिक कार्यक्रम और वृक्षारोपण अभियान आयोजित किए जाते हैं। हाल के वर्षों में हरेला को पर्यावरण जागरूकता से जोड़ते हुए इसे “हरियाली दिवस” के रूप में मनाया जाने लगा है। उत्तराखंड सरकार, स्कूलों, कॉलेजों और सामाजिक संगठनों द्वारा इस दिन हजारों पेड़ लगाए जाते हैं।

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