Tarkeshwar Dham: उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले में देवदार के घने जंगलों के बीच स्थित प्रसिद्ध ताड़केश्वर महादेव मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ देखने को मिली, इस अवसर पर उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और हरिद्वार से सांसद त्रिवेंद्र सिंह रावत ने मंदिर पहुंचकर भगवान शिव के दर्शन किए और विधि-विधान से पूजा-अर्चना की। उन्होंने प्रदेश की सुख-शांति और समृद्धि के लिए प्रार्थना भी की। पूजा के बाद मंदिर परिसर में विशाल भंडारे का आयोजन हुआ, जिसमें हजारों श्रद्धालुओं ने प्रसाद ग्रहण किया।
देवदार के जंगलों के बीच स्थित है ताड़केश्वर महादेव मंदिर
लैंसडाउन से करीब 36 किलोमीटर दूर और समुद्र तल से लगभग 1,800 मीटर की ऊंचाई पर स्थित ताड़केश्वर महादेव मंदिर अपनी प्राकृतिक सुंदरता और धार्मिक मान्यताओं के लिए प्रसिद्ध है। चारों ओर देवदार के ऊंचे पेड़ों से घिरा यह मंदिर पौड़ी गढ़वाल के प्रमुख शिव धामों में गिना जाता है। यहां सालभर श्रद्धालु भगवान शिव के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। “पौड़ी गढ़वाल जिला प्रशासन की मंदिर संबंधी जानकारी”
पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने भी मंदिर पहुंचकर अपने आराध्य के दर्शन किए। उन्होंने पूजा-अर्चना के बाद प्रदेश और देश की खुशहाली की कामना की। इसके बाद आयोजित भंडारे में उन्होंने खुद श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरित किया।
84 पट्टी के क्षेत्रपाल देवता माने जाते हैं ताड़केश्वर महादेव
मंदिर में दर्शन के दौरान त्रिवेंद्र सिंह रावत ने यहां की धार्मिक परंपराओं और मान्यताओं का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि ताड़केश्वर महादेव को 84 पट्टी क्षेत्र का क्षेत्रपाल देवता माना जाता है। स्थानीय परंपरा के अनुसार, गाय और भैंस के पहले दूध को भगवान को अर्पित किया जाता है। इसी तरह नई फसल तैयार होने पर उसका कुछ हिस्सा भी मंदिर में चढ़ाया जाता है।
त्रिशूल जैसी आकृति वाला देवदार का पेड़ है खास आकर्षण
ताड़केश्वर मंदिर परिसर में एक अनोखा देवदार का वृक्ष भी श्रद्धालुओं और पर्यटकों का ध्यान खींचता है। इसकी शाखाएं इस तरह फैली हुई हैं कि पूरा पेड़ त्रिशूल जैसा दिखाई देता है। स्थानीय श्रद्धालु इसे भगवान शिव की दिव्य शक्ति का प्रतीक मानते हैं।
मंदिर के पुजारी चंद्रकांत जुयाल के अनुसार, पौराणिक मान्यता इस स्थान को राक्षस ताड़कासुर की तपस्या से जोड़ती है। कहा जाता है कि ताड़कासुर ने यहां भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कठोर तप किया था। बाद में भगवान शिव के पुत्र कार्तिकेय ने उसका वध किया। इसी मान्यता के चलते इस स्थान को ताड़केश्वर धाम कहा जाता है।
भूवैज्ञानिक दृष्टि से भी खास है मंदिर परिसर
धार्मिक महत्व के साथ ताड़केश्वर मंदिर का परिसर भूवैज्ञानिक दृष्टि से भी विशेष माना जाता है। भूवैज्ञानिक प्रोफेसर दीपक भट्ट के मुताबिक, मंदिर का निर्माण लगभग आठवीं शताब्दी के आसपास हुआ माना जाता है। उन्होंने परिसर की भौगोलिक बनावट का उल्लेख करते हुए बताया कि यह क्षेत्र कटोरे जैसी संरचना में दिखाई देता है और यहां भू-धंसाव के संकेत नजर आते हैं।
उनके अनुसार, भूगर्भीय गतिविधियों के कारण समय के साथ इस क्षेत्र की बनावट में बदलाव आया हो सकता है। भविष्य में संभावित भू-धंसाव को समझने के लिए इस क्षेत्र का वैज्ञानिक अध्ययन महत्वपूर्ण है।
ज्येष्ठ और अश्विन मास में होती है विशेष पूजा
ताड़केश्वर महादेव मंदिर में ज्येष्ठ और अश्विन मास के दौरान विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। उत्तराखंड के विभिन्न जिलों के अलावा दूसरे क्षेत्रों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं। भक्तों के बीच मान्यता है कि सच्चे मन से भगवान शिव के दरबार में मांगी गई मनोकामना पूरी होती है।
देवदार के घने जंगलों, शांत वातावरण और प्राचीन धार्मिक परंपराओं के कारण ताड़केश्वर धाम उत्तराखंड की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक पहचान का अहम हिस्सा बना हुआ है।