उत्तरायणी मेले की पहचान रिंगाल कारोबार…अब विलुप्ति की कगार पर

उत्तरायणी का मेला रिंगाल, तांबा उत्पादकों और हस्तशिल्पियों के लिए संजीवनी का काम करता है। ताम्रशिल्पी, हस्तशिल्पी सालभर से उत्तरायणी मेले का इंतजार करते हैं। करीब आठ दिन तक चलने वाले मेले से लघु उद्यमियों को काफी उम्मीद रहती है। लेकिन इस बार इन

लघु उद्यमियों को मेले से निराशा हाथ लग रही है।

 

 

बता दें कि बागेश्वर जिले में खर्कटम्टा में तांबे का कारोबार होता है। कपकोट के दानपुर क्षेत्र को हस्तशिल्प उद्योग के लिए जाना जाता है। इसी तरह दानपुर क्षेत्र में रिंगाल से बनी कृषि उपयोगी सामग्री का निर्माण होता है। दानपुर क्षेत्र में रिंगाल से बनाई गई कई तरह की आकर्षक वस्तुओं के लिए मशहूर है। रिंगाल से दैनिक उपयोग की वस्तुएं जैसे चटाइयां, टोकरियां, सूपे, आसन समेत कई आकर्षक वस्तुएं बएं नाई जाती हैं। रिंगाल से बनी इन वस्तुओं की कुछ अलग ही खास पहचान है।

लगभग 3 हजार से 7 हजार फीट की उंचाई पर बांस प्रजाति का रेशेदार रिंगाल प्रचुर मात्रा में होता है। उच्च हिमालयी क्षेत्र दानपुर में रिंगाल का यह काम प्राचीन समय से चला आ रहा है। अपनी जरूरतों के मुताबिक स्थानीय लोग ढोका, ढलिया, अनाज छाननेकी छलनी, चटाई, रोटी रखनेके लिए छापरी आदि जरूरत की चीजों को स्वयं बना लेते हैं और वस्तुओं को बनाकर अपनी आजीविका चलाते हैं। इस काम से जुड़े लोगों ने उद्योग विभाग व कुछ स्वयंसेवी संस्थाओं की मदद से रिंगाल के नए-नए डिजाइन निकालने का प्रशिक्षण भी लिया।  लेकिन अत्यधिक श्रम, समय और उचित मूल्य नहीं मिलने से ये लोग अब इस परंपरागत व्यापार को छोड़ने को मजबूर हैं।

रिंगाल से संबंधित उद्योग नहीं लगने से यहां कुछ काश्तकारों ने अपने पैतृक धंधे से मुंह मोड़ना शुरू कर दिया है। क्योंकि रिंगाल के काम ने गति नहीं पकड़ी, जिसका कारण उचित विपणन व्यवस्था ना हो पाना है। इस काम में जुड़ा लगभग हर परिवार अब विपणन की समस्या से जूझ रहा है। यही कारण है कि उत्तरायणी मेले में आए व्यापारी भी उनकी मेहनत के अनुरूप मूल्य ना मिलने से निराश हैं।

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