Indore: पहली नजर में ये मूर्ति आपको साधारण गणेश प्रतिमा लग सकती है जिसे गणेश उत्सव की शुरुआत से पहले अंतिम रूप देने में कलाकार जी जान से जुटे हैं लेकिन जब आप इसे गौर से देखेंगे तो ये आपको बेहद खास लगेगी। प्रतिमा की बारीकियों को निहारने और विशिष्ट होल्कर शैली की पगड़ी देखकर आपको एहसास हो जाएगा कि ये इंदौर की शाही परंपराओं में रची-बसी एक डिजाइन का हिस्सा है। एक ऐसी परंपरा जो लगभग दो सौ साल से चली आ रही है। खरगोनकर परिवार करीब दो सदियों से इसी शाही शैली में गणेश प्रतिमाएं बनाता आ रहा है, और अपनी परंपरा को संजोए हुए है। इसे उनके पूर्वजों ने होल्कर राज दरबार के लिए स्थापित किया था।
मूर्तिकार श्याम खरगोनकर ने बताया कि “यह परंपरा अहिल्या माता होल्कर के समय से, जिस समय गणेश उत्सव की शुरुआत हुई उस समय हमारे फॉर फादर परदादा होल्कर स्टेट में आर्टिस्ट के रूप में कार्य करते थे। तो इसलिए उनको राज्य सरकार ने ये कहा कि भई क्योंकि आप हमारे राज्य दरबार के आर्टिस्ट हो अब गणेश उत्सव की शुरुआत हो रही है। तो आप ही गणेश हमारे दरबार के लिए गणेश प्रतिमा के निर्माण करो। लेकिन गणेश प्रतिमा का निर्माण ऐसा हो कि जिसमें ‘गजमुख’ (हाथी के मुख वाला) आकार हो, क्योंकि हाथी की सूंड लगी हुई थी वहां गणेश जी के। तो गजमुख आकार हो और होल्करी पगड़ी धारण किए हो, क्योंकि जो महाराज सरकार पहनते थे, होल्करी पगड़ी। तो उस टाइप की होल्करी पगड़ी धराण कराकर और भारदस्त ऐसा लगे कि ये राज दरबार के लिए बना हुआ है गणेश जी, हां शाही राज दरबार के लिए बना हुआ गणेश जी है। तो तरीके का डिजाइन आप करो। तो उस डिजाइन की प्रतिमा ये बनने लगे और आज तक 200 सालों से ये परंपरा चल रही है।”
यह परिवार एक अनूठी परंपरा का भी पालन करता है जिसकी त्योहार से महीनों पहले शुरुआत हो जाती है। मूर्तिकार अंजलि खरगोनकर ने कहा कि “बसंत पंचमी से हम लोग तीन मूर्तियां बनाना चालू, छोटी सी तीन मूर्तियां विधि-विधान से पूजा-पाठ करके छोटी तीन मूर्तियां बनाते हैं, प्रतीकात्मक रूप से और फिर जब ये बड़ी मूर्तियों का निर्माण करना चालू कर देते हैं मई-जून में तो वो तीन मूर्तियों को हम इनके पेट में स्थापित करते हैं। तो ये माना जाता है कि इनका निर्माण भी बसंत पंचमी से ही शुरू हुआ। अभी तो छोटी-छोटी जैसे ये सब ये मूर्तियां हैं ये छोटी ये तो मैं अभी घर पर बैठकर बना लेती हूं। लेकिन जब से पेंटिंग शुरू और बीच-बीच में इनके साथ में यहां आती रहती हूं और जितना बन पड़ता है उतना पूरा सहयोग इनसे करती हूं मैं और जब से पेंटिंग करने का काम चालू हो गया है, तब से तो फिर अब मैं रोजाना यहां आकर और जितना फ्री होता है, मैं करती हूं।”
खरगोनकर परिवार का कहना है कि वे कई तरह की मूर्तियां बनाते हैं। इनमें बड़ी और छोटी दोनों, तरह की मूर्तियां होती हैं लेकिन इन मूर्तियों को किसी व्यवसाय के लिए नहीं, बप्पा की भक्ति के लिए बनाया जाता है।
मूर्तिकार श्याम खरगोनकर ने बताया कि “जब से गणेश जी बनाना शुरू किया है, पूर्व से तो हम तब से इको-फ्रेंडली मतलब पीली मिट्टी के निर्मित गणेश जी और इसमें वॉटरकलर ये सब इको-फ्रेंडली वॉटरकलर, इको-फ्रेंडली मिट्टी और सब साधन जो भी लगता है, वो सब इको-फ्रेंडली होता है जो पानी में घुलनशील है। बड़ी प्रतिमा और छोटी प्रतिमा सब मिलकर 150 के करीब बनती है। क्योंकि अपना क्या है ये प्रोफेशन नहीं होते हुए एक सेवा है गणेश जी की। तो हम इसको व्यापार नहीं समझते हम इसको मिली हुई कला, विरासत में मिला हुआ भगवान गणेश जी का आशीर्वाद और पूरे परिवार से गणेश जी की सेवा कराना, ये बहुत बड़ी बात है।”
एक मूर्ति को पूरा करने में लगभग 15 दिन लगते हैं। इस साल गणेश चौथ का त्योहार 14 सितंबर को मनाया जाएगा। एक हफ्ते से भी कम समय बचने से खरगोनकर परिवार मूर्तियों को आकार देने, सुखाने और रंगने के विभिन्न चरणों पर एक साथ काम कर रहा है, ताकि हर मूर्ति गणेश चौथ से पहले तैयार हो जाए।