US-Iran deal: अमेरिका-ईरान शांति समझौते से भारत के निर्यात को बढ़ावा, रुपये को सहारा मिलने की उम्मीद

US-Iran deal:  अमेरिका और ईरान के बीच 107 दिन लंबे संघर्ष को समाप्त करने और होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने के समझौते से भारत की अर्थव्यवस्था को कई मोर्चों पर राहत मिलने की उम्मीद है। निर्यातकों और विशेषज्ञों का मानना है कि इस समझौते से पश्चिम एशिया को होने वाले भारत के निर्यात में तेजी आएगी, विनिर्माण गतिविधियों को गति मिलेगी और रुपये को स्थिरता मिलेगी। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि यह समझौता सफलतापूर्वक लागू होता है तो भारत के आयात की लागत पर दबाव कम होगा, महंगाई नियंत्रित होगी और व्यापार के लिए अनुकूल माहौल बनेगा।

शांति समझौते पर 19 जून को स्विट्जरलैंड में औपचारिक तौर पर हस्ताक्षर किए जाएंगे। अमेरिका और ईरान के बीच चार महीने से जारी युद्ध समाप्त करने के लिए शांति समझौता हो गया है। इस संघर्ष के कारण वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति बाधित हुई, कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गईं और पूरा पश्चिम एशिया व्यापक क्षेत्रीय संघर्ष के कगार पर आ गया था। आर्थिक शोध संस्थान ‘ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव’ (जीटीआरआई) के संस्थापक अजय श्रीवास्तव ने कहा कि यह समझौता भारत के लिए तत्काल आर्थिक राहत लेकर आएगा। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए पश्चिम एशिया पर काफी निर्भर है। करीब 50 प्रतिशत कच्चा तेल, 70 प्रतिशत एलपीजी और लगभग 90 प्रतिशत एलएनजी यहीं से आते हैं।

जीटीआरआई के अनुसार, भारत के लिए, जो कच्चे तेल, द्रवीकृत पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) और द्रवीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) की आपूर्ति के लिए पश्चिम एशिया पर काफी निर्भर है, यह समझौता ऊंची ऊर्जा कीमतों, रुपये पर दबाव और संघर्ष के दौरान बढ़े महंगाई जोखिमों से राहत का वादा करता है। संघर्ष के दौरान खाड़ी क्षेत्र में आवाजाही बाधित होने से भारत की ऊर्जा आयात लागत बढ़ी, महंगाई का दबाव बढ़ा, रुपया कमजोर हुआ और रिफाइनरियों को दूर-दराज के बाजारों से तेल मंगाना पड़ा।

होर्मुज जलडमरूमध्य के खुलने से ऊर्जा बाजार स्थिर होंगे, तेल-गैस की कीमतों पर दबाव कम होगा, रुपये को मजबूती मिलेगी और आर्थिक वृद्धि के लिए बेहतर माहौल बनेगा। निर्यातक एवं टेक्नोक्राफ्ट इंडस्ट्रीज इंडिया के संस्थापक चेयरमैन शरद कुमार सराफ ने कहा कि इस घोषणा से अनिश्चितता और आर्थिक सुस्ती खत्म होने का रास्ता खुलेगा। उन्होंने कहा, ‘‘ युद्ध और तनाव के समाप्त होने से भारत के निर्यात में तेज वृद्धि होगी और नए कारोबारी अवसर उत्पन्न होंगे। अगले दो से तीन साल ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य को गति देंगे।’’

वहीं, फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गेनाइजेशन्स (फियो) के अध्यक्ष एस. सी. राल्हन ने कहा कि क्षेत्र में भू-राजनीतिक तनाव कम होने से वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति सामान्य होगी और कीमतें नियंत्रित रहेंगी। उन्होंने कहा कि इससे भारत की आयात लागत पर दबाव घटेगा, निर्यात सामान्य होंगे, रुपया स्थिर रहेगा और महंगाई संबंधी चिंताएं कम होंगी। विशेषज्ञों ने यह भी कहा कि होर्मुज जलडमरूमध्य खुलने से अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों में जहाजों की आवाजाही सुचारू होगी। अभी जहाजों को अफ्रीका के केप ऑफ गुड होप के रास्ते लंबा चक्कर लगाना पड़ रहा था, जिससे बीमा एवं मालभाड़ा लागत बढ़ गई और आपूर्ति में देरी हो रही है। अमेरिका-ईरान युद्ध ने पश्चिम एशिया क्षेत्र के साथ भारत के व्यापार को गंभीर रूप से प्रभावित किया।

इस क्षेत्र के सभी छह देश- संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), ओमान, कतर, सऊदी अरब, बहरीन और कुवैत भारत के प्रमुख व्यापारिक साझेदार हैं। यह संघर्ष 28 फरवरी को शुरू हुआ था, जब अमेरिका और इजराइल ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर सैन्य अभियान शुरू किया। इसका असर भारत के निर्यात पर साफ दिखा। मार्च में देश का निर्यात 7.44 प्रतिशत घटकर 38.92 अरब डॉलर रह गया, जो पांच महीनों की सबसे बड़ी गिरावट है। पश्चिम एशिया क्षेत्र को निर्यात 57.95 प्रतिशत घटकर 3.5 अरब डॉलर रह गया, जबकि सामान्य तौर पर यह करीब छह अरब डॉलर रहता है। इसी अवधि में खाड़ी देशों से आयात भी 51.64 प्रतिशत गिरा। खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी) के साथ भारत का कुल व्यापार मिला-जुला रुख दिखाता है। 2024-25 में भारत का निर्यात लगभग एक प्रतिशत बढ़कर 57 अरब डॉलर रहा, जबकि आयात 15.33 प्रतिशत बढ़कर 121.7 अरब डॉलर हो गया।

संयुक्त अरब अमीरात भारत का तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार रहा। 2025-26 में निर्यात दो प्रतिशत बढ़कर 37.4 अरब डॉलर और आयात 63.9 अरब डॉलर रहा, जिससे 26.53 अरब डॉलर का व्यापार घाटा हुआ। सऊदी अरब पांचवां सबसे बड़ा साझेदार रहा। निर्यात 12.55 प्रतिशत घटकर 110.28 अरब डॉलर, जबकि आयात 2.22 प्रतिशत बढ़कर 30.8 अरब डॉलर और व्यापार घाटा 20.5 अरब डॉलर रहा।

कतर को निर्यात 3.7 प्रतिशत घटकर 1.62 अरब डॉलर और आयात 1.37 प्रतिशत की गिरावट के साथ 12.3 अरब डॉलर और घाटा 10.7 अरब डॉलर रहा। ओमान को निर्यात एक प्रतिशत घटकर 4.02 अरब डॉलर और आयात 9.43 प्रतिशत की बढ़त के साथ 7.16 अरब डॉलर और घाटा 3.14 अरब डॉलर रहा। कुवैत को निर्यात 1.65 अरब डॉलर, आयात 7.91 अरब डॉलर और घाटा 6.26 अरब डॉलर रहा। बहरीन को निर्यात 77.9 करोड़ डॉलर, आयात 88.77 करोड़ डॉलर और घाटा 10.87 करोड़ डॉलर रहा।

भारत के प्रमुख निर्यात में इंजीनियरिंग सामान, रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पाद, खाद्य एवं कृषि उत्पाद, चावल, मांस, समुद्री उत्पाद, रत्न एवं आभूषण, रसायन, दवाएं, वस्त्र तथा मशीनरी शामिल हैं। वहीं, आयात में कच्चा तेल, एलएनजी, एलपीजी, पेट्रोरसायन, उर्वरक, प्लास्टिक, एल्यूमीनियम और अन्य खनिज ईंधन प्रमुख हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अब शांति समझौते के बाद स्थिति सामान्य होने पर भारत का इस क्षेत्र के साथ व्यापार फिर से गति पकड़ सकता है।

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