हर बीमारी में चमत्कारी है चिरायता, जानें फायदे

नमिता बिष्ट

देवभूमि उत्तराखंड को प्राकृतिक वनस्पतियों और औषधियों की भी जननी कहा जाता है। चरक संहिता में इस क्षेत्र को वनस्पतिक बगीचा भी कहा गया है। यहां लगभग 500 प्रकार की औषधियां पाई जाती हैं। इन्हीं में से एक है चिरायता…इसे कई बीमारियों में औषधी के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। हालांकि इसका स्वाद बेहद कड़वा होता है, लेकिन सच यह है कि जितना चिरायता का स्वाद कड़वा होता है उतना ही रोगों के इलाज में चिरायता से फायदे मिलते हैं। तो चलिए जानते हैं इससे मिलने वाले फायदे के बारे में……….

हिमालयी क्षेत्र में पाया जाता है चिरायता का पौधा
चिरायता हिमालयी क्षेत्रों में पाया जाने वाला औषधीय पौधा है। उत्तराखंड में यह समुद्र तल से 1200 से लेकर 3 हजार मीटर की ऊंचाई तक बसे गांवों में पाया जाता है। इसका वैज्ञानिक नाम स्वैरसिया चिरायता है। चिरायता का पौधा एक से 1.5 मीटर तक लंबा होता है। इसकी पत्तियाँ छोटी छोटी और तुलसी की पत्तियों के बराबर होती है। जाडे़ के दिनों में इसके फूल लगते हैं। सूखा पौधा जड़, डंठल, फूल, सब औषधि के काम में आता है।

औषधीय गुणों से भरपूर चिरायता
औषधीय गुणों के कारण आयुर्वेद में इसका अत्यधिक महत्व है। चिरायता से एक-दो नहीं बल्कि कई रोगों का इलाज किया जा सकता है। दरअसल चिरायता में चिराटिन, स्वर्चिरिन जैसे अवयव होने के कारण यह औषधीय गुणों से भरपूर है। ज्वर नाशक और रक्तशोधक होने के साथ ही यह आंखों से संबंधित बीमारियों, मलेरिया, बुखार, शरीर की सूजन को कम करने, दमा, गठिया, मूत्र विकार और त्वचा रोगों में कारगर साबित होता है।

एक पौधे में 24 किस्म के तत्व मौजूद
चिरायता का एक बड़ा गुण यह भी है कि रक्त से टाक्सिन को निकाल बाहार करता है। इसके अलावा यह टिश्यू को क्षति होने से रोकता है, जिससे लिवर के स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। बता दें कि चिरायता के जड़, पत्तों, टहनी, फल में 24 किस्म के तत्व मौजूद होते हैं। जो शरीर को कई समस्याओं से बचाने में मदद करते हैं। इतना ही नहीं कैंसर जैसे रोगों को भी ठीक करने में कारगर साबित होता है।

देहाती घरेलू नुस्खा है चिरायता
चिरायता एक प्रकार से एक देहाती घरेलू नुस्खा है। पहले चिरायते को घर में सूखा कर बनाया जाता था, हालांकि आज कल यह बाजार में कुटकी चिरायता के नाम से भी मिलता है। लेकिन घर पर बना हुआ ताजा और विशुद्ध चिरायता ही अधिक कारगर होता है। अक्सर जब खुजली, रक्त विकार या त्वचा से संबंधित किसी तरह की बीमारी होती है तो घर के बड़े-बुजुर्ग चिरायता का सेवन करने की सलाह देते हैं। हालांकि चिरायता का स्वाद बहुत ही कड़वा होता है, लेकिन जितना चिरायता का स्वाद कड़वा होता है उतना ही रोगों के इलाज में चिरायता से फायदे मिलते हैं।

घर पर ऐसे बनाएं चूर्ण
100 ग्राम सूखी तुलसी के पत्ते का चूर्ण, 100 ग्राम नीम की सूखी पत्तियों का चूर्ण, 100 ग्राम सूखे चिरायता का चूर्ण लीजिए। इन तीनों को समान मात्रा में मिलाकर एक बड़े डिब्बे में भर कर रख लीजिए। यह तैयार चूर्ण मलेरिया या अन्य बुखार होने की स्थिति में दिन में तीन बार दूध से सेवन करें। इसके सेवन से शरीर के सारे कीटाणु मर जाते हैं।
खतरे की श्रेणी में है चिरायता
राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड भारत सरकार के अनुसार भारत में इसकी वार्षिक खपत 404.70 टन है। यह भारत में नेपाल से आयात किया जाता है। प्राकृतिक रुप से भूमि का क्षरण, जलवायु परिवर्तन और अत्यधिक विदोहन के कारण यह प्रजाति खतरे की श्रेणी में आ गई है। औषधीय गुणों से भरपूर चिरायता की बाजार में हर साल मांग बढ़ रही है। लेकिन चिरायता का आयात कम करने के लिए वृहद स्तर पर इसके व्यावसायिक कृषिकरण पर जोर दिया जा रहा है।

नंदनगर के गांवों में फलेगी चिरायता की खेती
चमोली जनपद के नंदानगर विकास खंड के गांवों के काश्तकार अब परंपरागत खेती के साथ चिरायता की भी खेती करेंगे। इसके लिए गुजरात के झंडू फाउंडेशन और गढ़वाल विवि के उच्च शिखरीय पादप कार्यिकी शोध केंद्र की ओर से नंदानगर विकास खंड के खुनाणा, रामणी, पडेरगांव, घेस, पगना, भेंटी और बंगाली गांव के काश्तकारों को चिरायता के करीब तीन हजार पौधे वितरित किए गए। इसके साथ ही काश्तकारों को तकनीकी सहयोग भी दिया जा रहा है। बता दें कि जनपद में जोशीमठ, दशोली, देवाल, थराली और नंदानगर क्षेत्र की भूमि जड़ी-बूटी के कृषिकरण के लिए सही है। जिसके बाद ग्रामीण इसके कृषिकरण में जुट गए हैं।

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