Delhi: भारत ने संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन से ठीक पहले विकसित और विकासशील देशों के बीच जलवायु न्याय और समानता की अपनी मांग को एक बार फिर पुरजोर तरीके से दोहराया है। नई दिल्ली में एनजीटी यानी राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में प्रधानमंत्री मोदी ने प्रकृति और सततता के साथ भारत के सांस्कृतिक संबंधों पर जोर दिया। वहीं नीति निर्माताओं ने ऐतिहासिक उत्सर्जन के लिए विकसित देशों की जिम्मेदारी पर सबसे ज्यादा जोर दिया।
ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के ठीक बाद हुए इस सम्मेलन में भारत में ऊर्जा के क्षेत्र में हो रहे बदलावों पर भी जोर दिया गया। देश की कुल बिजली उत्पादन क्षमता का आधे से ज्यादा हिस्सा अब ऐसे स्रोतों से आता है जो जीवाश्म ईंधन पर आधारित नहीं हैं। यह लक्ष्य तय समय से पहले ही हासिल कर लिया गया
है।
हालांकि, जैसे-जैसे जलवायु से जुड़े अंतरराष्ट्रीय वादे और बड़े होते जा रहे हैं, जानकार इस बात पर जोर देते हैं कि इसमें समानता का ध्यान रखना जरूरी है। हालांकि, असल में बिजली बनाने में अलग तरह की चुनौतियां हैं। भले ही नॉन-फॉसिल फ्यूल यानी जीवाश्म ईंधन के बिना बनने वाली ऊर्जा की क्षमता बढ़ी है, लेकिन भारत में बिजली उत्पादन का लगभग दो-तिहाई हिस्सा अब भी कोयले से ही होता है।
जलवायु कार्यकर्ताओं ने रिन्यूएबल एनर्जी यानी नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में हुई बढ़ोतरी का स्वागत किया है, लेकिन वे जीवाश्म ईंधन पर लगातार निर्भरता की ओर भी इशारा करते हैं, क्योंकि हवा की खराब गुणवत्ता और भीषण गर्मी का लोगों पर तुरंत असर पड़ रहा है। ‘संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन’ में अब कुछ ही हफ्ते बचे हैं, ऐसे में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के बाद हुई कॉन्फ्रेंस ने भारत के पक्ष को मजबूत आधार देने के लिए माहौल तैयार कर दिया है। इससे उन दलीलों की झलक मिलती है जिन्हें नई दिल्ली वैश्विक मंच पर फिर से दोहरा सकती है।