Prayagraj: उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में रामलीला मंचन की तैयारियां जोर-शोर से चल रही है। कारीगर रामलीला के दौरान इस्तेमाल होने वाले साजो-सामान को अंतिम रूप देने में जुटे हैं। खास बात ये है कि इन्हें मुस्लिम समुदाय के कारीगर तैयार कर रहे हैं, जोकि हिंदू महाकाव्य की कहानी को जीवंत बनाने में मदद करेंगे।
रामलीला मंचन के दौरान इस्तेमाल होने वाला सारा सामान यहीं तैयार किया जाता है। धनुष-बाण, गदा, तलवारें और रावण का भव्य रथ भी बनाया जाता है। प्रयागराज की ये कार्यशाला गंगा-जमुनी तहजीब की बेहतरीन मिसाल है। ये सिर्फ कहने की बात नहीं, बल्कि कई पीढ़ियों से चली आ रही एक परंपरा है।
कारीगर निसार अहमद “रामलीला से लगभग 15 दिन पहले से काम शुरू होता है और रामलीला जब तक रहती है तब तक काम होता रहता है। कुछ न कुछ जो भी लाइट, साउंड, रामलीला मंच पर जाना होता है और जो सेट पर लगना होता है वो उसी हिसाब से क्रम से काम होता रहता है।
‘गंगा-जमुनी तहजीब’ उत्तर भारत की मिली-जुली संस्कृति को कहा जाता है। ये संस्कृति हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच लंबे समय से चले आ रहे अपसी प्रेम और मेल-जोल से बनी है। खास तौर पर गंगा और यमुना के आसपास के इलाकों में ये परंपरा देखने को मिलती है।
कारीगरों का कहनअ है कि “कोई आपत्ति नहीं है। हम तो मंदिरों में भी काम करते हैं यहां भी करते हैं। ये सद्भावना की नियत से काम करते हैं। इसलिए ऐसी कोई बात नहीं है। कारीगरों को उम्मीद है कि वो अपनी कला के साथ-साथ पूर्वजों से मिली इस संस्कृति को भी आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाएंगे।