Hockey: विश्व कप में दबाव का सामना शांत रहकर करने को सफलता की कुंजी मानने वाली भारतीय महिला हॉकी टीम की होनहार गोलकीपर इस हुनर के लिए पूर्व भारतीय क्रिकेटर एम.एस. धोनी को आदर्श मानती हैं और उन्हीं के नक्शेकदम पर चलने की कोशिश करती हैं। दूसरा विश्व कप खेल रही बिछू ने पीटीआई वीडियो को दिए इंटरव्यू में कहा,‘‘धोनी जिस तरह से दबाव में भी शांत रहते हैं, मैं भी वैसा ही करने की कोशिश करती हूं। यही सोचती हूं कि डर के आगे जीत है। कितना भी दबाव सामने आए, मैं शांत रहूंगी। जब उनकी फिल्म आई तो मैंने बार बार देखी। उन्होंने जीवन में इतना संघर्ष किया और इतनी ऊंचाई तक पहुंचे, उनसे बहुत प्रेरणा मिलती है।’’
भारतीय टीम को एफआईएच हॉकी विश्व कप में पहला मुकाबला 16 अगस्त को चीन से खेलना है और मणिपुर की 26 वर्ष की इस खिलाड़ी ने कहा कि वे सफलता के लिए बेसिक्स पर अमल करने में विश्वास रखती हैं। उन्होंने कहा,‘‘अब कुछ ज्यादा सोचना नहीं है। जो अब तक तैयारी की है, उसी पर फोकस है। कुछ अतिरिक्त प्रयास नहीं करना है।’’
पिछले विश्व कप से अब तक के सफर में बिछू की सोच में भी काफी बदलाव आया है और बड़े टूर्नामेंट या दिग्गज टीमों की ख्याति से वे डरती नहीं है। उन्होंने कहा,‘‘मैं पिछले विश्व कप में बिल्कुल नई थी और बहुत दबाव ले लिया था कि इतने बड़े टूर्नामेंट में कैसे खेलूंगी लेकिन अब परिपक्वता आई है और फोकस बस अच्छे प्रदर्शन पर है।’’
बिछू ने कहा,‘‘आक्रामक हॉकी के इस दौर में दुनिया की शीर्ष स्ट्राइकरों के सामने अब दिक्कत नहीं होती। हमने बड़ी टीमों के खिलाफ इतने मैच खेले हैं कि अब फर्क नहीं पड़ता। बस मैदान पर शांत रहकर फैसले लेने हैं जो मैं ले लूंगी।’’
सविता पूनिया जैसी दिग्गज गोलकीपर के टीम में होने के बावजूद अपनी पहचान बनाने वाली बिछू दरअसल हॉकी नहीं, फुटबॉल खेलना चाहती थीं लेकिन ट्रायल के लिए पहुंचने में देरी होने से उनकी किस्मत बदल गई।
उन्होंने बताया,‘‘मैं गलती से हॉकी खिलाड़ी बनी हूं क्योंकि मैंने फुटबॉलर बनने का सपना देखा था। इंफाल साइ सेंटर पर ट्रायल देने गई थी लेकिन एक दिन देरी होने से वेकेंसी फुल हो गई थी। वहां साइ के निदेशक ने पापा से बोला कि इसको हॉकी खेलने दो, कुछ महीने बाद फुटबॉल टीम में ले लेंगे। मैंने हॉकी के सारे ट्रायल पास कर लिए लेकिन दो महीने बाद फुटबॉल टीम के लिए पूछा तो उन्होंने कहा कि साइ में अब हॉकी खिलाड़ी के रूप में नाम दर्ज हैं तो फुटबॉल नहीं खेल सकती।’’
उन्होंने कहा,‘‘मैं बहुत रोई और पापा को बोला कि मुझे ले जाओ लेकिन उन्होंने समझाया। धीरे धीरे हॉकी में मन रमने लगा। लेकिन मैं शुरू में स्ट्राइकर थी और गोल करके जश्न मनाना मुझे अच्छा लगता था। फिर मणिपुर में नीलकमल सर साइ सेंटर आए थे जिन्होंने गोलकीपर बनाने की सलाह दी।’’ मध्य प्रदेश अकादमी में कैरियर का आगाज करने वाली बिछू को गोलकीपर की किट भी काफी देर से मिली और मिली भी तो उनके साइज की नहीं थी।
उन्होंने बताया,‘‘मैं मध्य प्रदेश अकादमी में 2015 में चली गई थी जहां से शुरूआत हुई। मुझे छह महीने बाद गोलकीपर की किट मिली लेकिन लेगगार्ड इतने बड़े थे कि कटवाकर खेलना पड़ा।’’ सविता के साथ अपने रिश्ते को प्रतिस्पर्धा का नहीं बल्कि एक दूसरे से सीखने का मानने वाली बिछू ने कहा कि उनके अनुभव से काफी मदद मिलती है ।
बिछू ने कहा,‘‘सविता दी से बहुत कुछ सीखने को मिला। उनसे लगातार पूछती हूं कि दिमाग में उस समय क्या चल रहा था या फैसले कैसे लेने हैं तो वे बताती हैं कि बाहरी आवाजों पर ध्यान नहीं देना है और अपने खेल पर फोकस रखना है। एक बड़ी बहन की तरह सिखाया है और मुझ से भी सीखती हैं। मैच में गोल खाने के बाद एक दूसरे का मनोबल बढ़ाते हैं। ’’