Ramleela: राजस्थान के बीकानेर में मोहसिन खान पठान पिछले 19 सालों से रामलीला का निर्देशन कर रहे हैं। वे हिंदू और मुस्लिम कलाकारों को एक साथ लाकर भगवान श्रीराम की महाकथा का मंचन करवाते हैं।
खान बताते हैं कि मुसलमान होने की वजह से उनके लिए रामलीला से जुड़ा रहना आसान नहीं रहा। हालांकि वो पूरे जोश के साथ फिर से मंच पर लौट आते हैं, क्योंकि उनका मानना है कि धर्म से बढ़कर इंसानियत है। लालगढ़ रेलवे स्टेशन के सामने एक पार्क में नेताजी सुभाष कला मंडल द्वारा आयोजित रामलीला, 1955 से हर साल मंचित की जा रही है।
इस आयोजन को मंच पर उतारने के लिए 80 से ज्यादा कलाकार और सहयोगी सदस्य मिलकर काम करते हैं। ये सभी बिना किसी पारिश्रमिक के स्वेच्छा से अपनी सेवाएं देते हैं। कलाकारों का कहना है कि ये रामलीला ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ की जीती-जागती मिसाल है। यह शब्द उन मिली-जुली सांस्कृतिक परंपराओं को दर्शाता है, जो सदियों से हिंदू-मुस्लिम मेल-जोल से विकसित हुई हैं, खासकर उत्तर और मध्य भारत में।
हर साल आयोजित होने वाली इस रामलीला को देखने के लिए अलग-अलग समुदायों के लोग जुटते हैं। वे इसे धार्मिक सद्भाव और भाईचारे के एक ऐसे उदाहरण के रूप में देखते हैं, जिसका असर मंच से कहीं आगे तक महसूस किया जाता है।
रामलीला भगवान श्रीराम के जीवन और महाकाव्य रामायण पर आधारित एक पारंपरिक नाटकीय मंचन है। इसे पारंपरिक रूप से नवरात्रि और दशहरा के त्योहारों के दौरान प्रस्तुत किया जाता है। इन प्रस्तुतियों में भगवान श्रीराम के जीवन के प्रसंगों को दिखाया जाता है, जिसमें रावण के साथ उनका युद्ध और बुराई पर उनकी जीत शामिल है।