Jaipur: क्या आपने कभी ऐसे दीयों के बारे में सोचा है, जो दिवाली की रात घर को रोशन करने के बाद भी आपके काम आ सकें? ऐसे दीये, जिन्हें त्योहार के बाद फेंकने के बजाय मिट्टी में मिलाकर नए पौधे उगाए जा सकें। जयपुर की श्री पिंजरापोल गौशाला से जुड़ी एक अनूठी पहल इसी सोच को साकार कर रही है। इस पहल के तहत ग्रामीण स्वयं सहायता समूहों की महिलाएं और युवा छात्र मिलकर गाय के गोबर से आकर्षक, रंग-बिरंगे और पर्यावरण के अनुकूल दीये तैयार कर रहे हैं। अलग-अलग आकार और डिजाइनों में बनाए जा रहे ये दीये पारंपरिक दीपावली की रौनक बढ़ाने के साथ प्रकृति के संरक्षण का संदेश भी दे रहे हैं।
इन दीयों की सबसे खास बात इन्हें बनाने में इस्तेमाल की जाने वाली सामग्री है। गाय के गोबर के पाउडर में मिट्टी और बाइंडिंग एजेंट मिलाया जाता है। इसके साथ अश्वगंधा, तुलसी और मोरिंगा के बीज भी डाले जाते हैं। तैयार मिश्रण को सांचों में ढालकर दीयों का आकार दिया जाता है और फिर उन्हें खूबसूरत रंगों से सजाया जाता है। मुस्कान बोधिया बताती हैं कि ये दीये गोबर और चिकनी मिट्टी से बनाए जा रहे हैं। इनमें अश्वगंधा, तुलसी और मोरिंगा के बीज शामिल किए गए हैं। ये पूरी तरह इको-फ्रेंडली हैं। दिवाली पर इस्तेमाल करने के बाद इन्हें घर के गमलों में डाला जा सकता है, जहां कुछ समय बाद बीज अंकुरित होकर पौधे का रूप ले सकते हैं।
स्टूडेंट इंटर्न जलेश के मुताबिक, दीयों को मजबूत बनाने के लिए मिट्टी और क्ले के साथ गोंद जैसे पदार्थ मिलाए जाते हैं, ताकि वे आसानी से टूटें नहीं और पानी के संपर्क में आते ही जल्दी खराब न हों। हालांकि, मिट्टी में डालने के बाद ये प्राकृतिक रूप से विघटित हो जाते हैं। इनमें मौजूद अश्वगंधा, तुलसी और मोरिंगा के बीजों से नए पौधे उगाने की संभावना भी रहती है।
इन दीयों का इस्तेमाल पूरा होने के बाद इन्हें गमलों या जमीन की मिट्टी में रखा जा सकता है। समय के साथ ये मिट्टी में घुल-मिल जाते हैं और इनमें मौजूद बीजों को अंकुरित होने का अवसर मिलता है। इस तरह दिवाली की रोशनी खत्म होने के बाद भी ये दीये हरियाली बढ़ाने में योगदान दे सकते हैं। डॉ. अतुल गुप्ता के अनुसार, गाय के गोबर से तैयार किए जा रहे इन दीयों को ग्रामीण इलाकों में दिवाली के उत्सव का हिस्सा बनाने की योजना है। इन्हें स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाएं तैयार कर रही हैं। साथ ही, कृषि स्टार्टअप और एग्री-एंटरप्रेन्योरशिप की ट्रेनिंग ले रहे विद्यार्थी भी इस काम में भागीदारी कर रहे हैं।
यह पहल केवल पर्यावरण के अनुकूल उत्पाद तैयार करने तक सीमित नहीं है। इससे ग्रामीण स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं को रोजगार और आमदनी के नए अवसर मिल रहे हैं। वहीं, युवा विद्यार्थियों को कृषि आधारित उद्यमिता को करीब से समझने और व्यावहारिक अनुभव हासिल करने का मौका मिल रहा है।
इस तरह जयपुर की यह पहल दिवाली के पारंपरिक उत्साह को एक नई सोच से जोड़ रही है, जहां गोबर से बने दीये पहले घरों को रोशन करेंगे और फिर मिट्टी में मिलकर नई हरियाली की उम्मीद जगाएंगे, ज्यादा संक्षिप्त और टीवी-फ्रेंडली बनाएंबाइट और वीओ का दोहराव घटाएं