Heatwave: देश में इन दिनों भीषण गर्मी पड़ रही है, तेज धूप और लू की वजह से लोगों का हाल बेहाल है। भीषण गर्मी का सबसे बुरा असर उन लोगों पर पड़ रहा है जिनके पास इससे निपटने के जरिये कम हैं। शहरों में रहने वाले गरीब, बाहर काम करने वाले लोग, गर्भवती महिलाएं और बुजुर्ग सबसे ज्यादा परेशान हैं। पूरे देश में तापमान बढ़ने के साथ पब्लिक हेल्थ, शहरी प्लानिंग और क्लाइमेट एक्शन के विशेषज्ञ- पैसिव कूलिंग जैसे समाधान पर जोर दे रहे हैं।
पैसिव कूलिंग का मतलब है ऐसे उपाय जिनमें एनर्जी की जरूरत नहीं होती और जो सस्ते तरीकों पर निर्भर करते हैं, जैसे कि क्रॉस-वेंटिलेशन पक्का करना, छाया का इंतजाम करना और इमारतों को ठंडा रखने के लिए छतों पर चूने जैसे मटीरियल से पेंट करना।
एम्स फिजीशियन डॉ. हर्षल साल्वे ने बताया कि “आप जानते हैं कि एक्टिव-कूलिंग के लिए एनर्जी की जरूरत होती है और इसकी अपनी लागत भी होती है। जब हम गरीब बस्तियों में रहने वाले कमजोर वर्गों की बात करते हैं, तो ये पैसिव कूलिंग तकनीकें अहम भूमिका निभाते हैं – ये उनके घरों में गर्मी के सीधे असर को कम करके उनकी मुश्किलों को दूर करने में मदद करते हैं। इसलिए, पैसिव कूलिंग के उपाय जैसे क्रॉस-वेंटिलेशन पक्का करना, खिड़कियों पर पर्दे लगाना,फर्श और छत पर चूने से पेंट करना। मैं कहूंगा कि ये सस्ते उपाय हैं।”
“जब हम गर्मी के संपर्क में आने से सेहत पर पड़ने वाले असर की बात करते हैं, तो हम इसे शॉर्ट-टर्म या एक्यूट (अचानक और गंभीर) मानते हैं। इसमें दौरे पड़ना, कन्फ्यूजन, मानसिक स्थिति बिगड़ने से लेकर स्ट्रोक तक शामिल हो सकता है – जो कि सबसे गंभीर असर है। लॉन्ग-टर्म असर शरीर में हीमोडायनामिक फिजियोलॉजी के जरिए हीमोडायनामिक्स में बदलाव के रूप में होता है। इससे ब्लड प्रेशर बढ़ सकता है और लंबे समय में हाइपरटेंशन और दिल से जुड़ी बीमारियां हो सकती हैं। अगर गर्भवती महिलाओं की बात करें, तो गर्मी प्रेग्नेंसी के नतीजों पर असर डालती है और नवजात शिशुओं पर भी असर डालती है, जैसे जन्म के समय कम वजन और समय से पहले जन्म और, कुछ स्टडीज में गर्भवती महिलाओं पर गर्मी के लॉन्ग-टर्म असर के तौर पर जन्मजात विकृतियों की भी बात कही गई है।”
विशेषज्ञ बताते हैं कि भीषण गर्मी का लोगों के स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ सकता है। सबसे ज्यादा खतरा गर्भवती महिलाओं, नवजात शिशुओं और दूसरे कमजोर वर्गों को होता है। अलग-अलग संस्थाओं के अलावा, यूनाइटेड नेशंस एनवायरनमेंट प्रोग्राम भारत के उन इलाकों में जहां गर्मी का असर सबसे ज्यादा होता है, वहां पैसिव कूलिंग के कई तरीकों को आजमा रहा है। इनमें कूल रूफ, इंसुलेशन और छाया की व्यवस्था करने से लेकर वेंटिलेशन और प्रकृति पर आधारित समाधान शामिल हैं।
राजस्थान में पैसिव कूलिंग स्टेशन शहरी और सेमी-अर्बन बस्तियों में अपनी पहचान बना रहे हैं। ये बाहर के तापमान से 12 डिग्री तक ठंडे रहते हैं। अध्ययन से पता चलता है कि ये उपाय तापमान कम करने के अलावा, नींद में सुधार कर सकते हैं, थकान कम कर सकते हैं और प्रोडक्टिविटी बढ़ा सकते हैं, जिससे लोगों को लंबे समय तक गर्मी के संपर्क में रहने में बेहतर मदद मिलती है।
हालांकि जानकार बताते हैं कि पैसिव कूलिंग उपाय भी मनचाहे नतीजे नहीं दे सकते। जानकारों का कहना है कि हीट एक्शन प्लान और हाउसिंग पॉलिसी में पैसिव कूलिंग के तरीकों को शामिल किया जाना चाहिए। लेकिन वो ये भी चेतावनी देते हैं कि इन प्लान को सिर्फ कागजों तक सीमित रखने के बजाय जमीनी स्तर पर लागू किया जाना चाहिए।