Varanasi: ‘मसाने की होली’ में शामिल हुए हजारों लोग, एक-दूसरे को लगाई भस्म

Varanasi:  डमरू की थाप और “हर हर महादेव” के जयकारों के साथ, हजारों शिव भक्त उत्तर प्रदेश में वाराणसी के हरिश्चंद्र घाट पर ‘मसाने की होली’ मनाने के लिए इकट्ठा हुए। यहां श्मशान घाट की चिता की भस्म के साथ त्योहार मनाया जाता है।

यह परंपरा वैराग्य और जीवन की क्षणभंगुर प्रकृति के विचारों से जुड़ी है, ये बताती है कि मृत्यु तो अटल है और जीवन चलते रहना चाहिए, यह परंपरा खास तौर पर काशी की शैव संस्कृति से जुड़ी है और रंगभरी एकादशी पर मनाई जाती है।

मसाने या मसान शब्द श्मशान से बना है, जिसका मतलब है श्मशान भूमि। यानी वो जगह जहां शवों का अंतिम संस्कार किया जाता है। भगवान शिव को ‘भूतनाथ’ या ‘भूतेश्वर’ कहा जाता है, क्योंकि उनके भक्तों और गणों में भूत, प्रेत, पिशाच, डाकिनी-शाकिनी जैसे अर्ध-दिव्य प्राणी शामिल हैं। माना जाता है कि वे श्मशान में निवास करते हैं।

मान्यता है कि भगवान शिव हिमालय में माता पार्वती से शादी के बाद काशी लौटे और उन्होंने अपने भक्तों के साथ होली मनाई, जिसमें ये अर्ध-दिव्य प्राणी भी शामिल थे। माना जाता है कि यहीं से मसाने की होली की शुरुआत हुई।

स्थानीय लोगों का कहना है कि  “यह पहला ऐसी बरात है जिसमें सृष्टि के जो पिता हैं उनकी बारात में हम शामिल होते हैं। मां गौरा हैं, पिता जी हैं, गणेश, कार्तिक सारे देवी-देवता आते हैं और रंगों की होली खेलते
हैं, गुलालों की होली खेलते हैं। कहा जाता है आज गुलाल शंकर जी के ऊपर चढ़ाते हैं तो आपके यहां रोगों का नाश होता है सारे कष्टों से आपको मुक्ति मिलती है। और आपका आने वाला जीवन सुख में बीतता है।”))

हालांकि, इस परंपरा की काशी विद्वत परिषद ने भी आलोचना की है, जो संस्कृत के विद्वानों और हिंदू धर्मग्रंथों के जानकारों की एक परिषद है। संस्था ने शहर के श्मशान घाटों पर मसाने की होली खेलने की पंरपरा का विरोध किया है, और इस मान्यता को चुनौती दी है कि यह एक पुरानी परंपरा है, या इसका उल्लेख शास्त्रों में मिलता है।

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