Jodhpur: दिवाली के त्योहार पर सोने-चांदी की खरीदारी को शुभ माना जाता है। खासकर चांदी के सिक्कों की मांग त्योहार के दौरान बढ़ जाती है। बाजार में कई तरह के सिक्के उपलब्ध हैं, लेकिन राजस्थान के जोधपुर में तैयार होने वाले चांदी के सिक्कों की अपनी अलग पहचान है। यहां एक पारिवारिक टकसाल कई पीढ़ियों से इस पारंपरिक कारोबार को आगे बढ़ा रही है।
जोधपुर स्थित ‘तुलसीराम सुरेश सोनी सिक्के वाला’ नाम की इस टकसाल में ‘टीएसएस’ ब्रांड के तहत चांदी के सिक्के बनाए जाते हैं। परिवार के सदस्य लंबे समय से इस काम से जुड़े हैं। टकसाल के मालिक कमल सोनी के मुताबिक, उनके पिता करीब 45 वर्षों से चांदी के सिक्के बनाने का काम कर रहे हैं। यहां ग्राहक अपनी चांदी लेकर आते हैं और अपनी पसंद के वजन व डिजाइन के अनुसार सिक्के तैयार करवाते हैं।
99 प्रतिशत तक शुद्धता का दावा
सिक्का निर्माताओं का कहना है कि जोधपुर में तैयार होने वाले सिक्कों की खासियत उनकी शुद्धता और शानदार फिनिशिंग है। यहां बनने वाले सिक्कों में चांदी की शुद्धता 99 प्रतिशत तक बताई जाती है। कुछ सिक्कों में यह स्तर 99.10 से 99.20 प्रतिशत तक भी पहुंचता है।
सिक्कों पर देवी-देवताओं की आकर्षक आकृतियां और बारीक डिजाइन इन्हें खास बनाते हैं। निर्माताओं के मुताबिक, यही वजह है कि जोधपुर के सिक्कों की मांग देश के कई हिस्सों में रहती है।
देशभर से सिक्के बनवाने पहुंचते हैं ग्राहक
इस पारिवारिक कारोबार की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि तमिलनाडु, कर्नाटक और गुजरात समेत कई राज्यों से ग्राहक यहां पहुंचते हैं। कई ग्राहक अपनी चांदी देकर अपनी जरूरत के मुताबिक सिक्के तैयार करवाते हैं।
ग्राहकों का कहना है कि वे लंबे समय से इसी टकसाल के सिक्के खरीद रहे हैं और टीएसएस ब्रांड पर भरोसा करते हैं। कुछ ग्राहक हर साल अपने गांव और आसपास के बाजारों में बिक्री के लिए यहां से सिक्के बनवाकर ले जाते हैं।
महंगी चांदी के बीच हल्के सिक्कों की नई रेंज
पिछले कुछ वर्षों में चांदी की कीमतों में तेजी आई है, लेकिन त्योहारों के दौरान सिक्कों की मांग बरकरार है। हालांकि, बढ़ती कीमतों के कारण ग्राहकों के खरीदारी बजट पर असर पड़ा है। इसे देखते हुए सिक्का निर्माताओं ने हल्के वजन वाले सिक्कों की नई वैरायटी तैयार की है।
इन सिक्कों का आकार और फिनिशिंग पहले जैसी रखी गई है, जबकि वजन कम किया गया है। इसका उद्देश्य कम बजट में भी ग्राहकों को चांदी के सिक्के खरीदने का विकल्प उपलब्ध कराना है।
पीढ़ियों से चली आ रही है सिक्के बनाने की परंपरा
जोधपुर की यह पारिवारिक टकसाल सिर्फ एक कारोबार नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही पारंपरिक कला का भी उदाहरण है। दिवाली से करीब चार महीने पहले ही यहां सिक्के बनाने का काम तेज हो जाता है। पूरे परिवार के साथ कारीगर भी इस काम में जुट जाते हैं।
सिक्का निर्माताओं को उम्मीद है कि गुणवत्ता, शुद्धता और ग्राहकों के भरोसे के दम पर यह पारंपरिक कारोबार आगे भी जारी रहेगा और आने वाली पीढ़ियां इस विरासत को आगे बढ़ाएंगी।