UNHRC में भारत की दोटूक, मानवाधिकार परिषद की विश्वसनीयता के लिए निष्पक्षता और समान व्यवहार जरूरी

UNHRC: भारत ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) से सभी देशों के प्रति निष्पक्ष और समान दृष्टिकोण अपनाने की अपील की है। भारत ने स्पष्ट किया कि किसी देश को प्रक्रिया में शामिल किए बिना उसके खिलाफ विशेष जनादेश तैयार करने से वहां मानवाधिकारों की वास्तविक स्थिति में सुधार होने की संभावना बेहद कम है। भारत के मुताबिक, परिषद की साख बनाए रखने के लिए राजनीतिक पक्षपात और दोहरे मानदंडों से दूर रहना आवश्यक है।

संयुक्त राष्ट्र महासभा में शुक्रवार को मानवाधिकार परिषद की रिपोर्ट पर आयोजित चर्चा के दौरान संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन की प्रथम सचिव भाविका मंगलानंदन ने देश का पक्ष रखा। उन्होंने अपने संबोधन में विदेश मंत्री एस. जयशंकर के उस विचार को भी दोहराया, जिसमें उन्होंने मानवाधिकारों के संरक्षण के लिए संवाद, क्षमता निर्माण और सार्थक साझेदारी को सबसे प्रभावी माध्यम बताया था।

जयशंकर ने इसी साल फरवरी में मानवाधिकार परिषद के 61वें उच्चस्तरीय सत्र में कहा था कि मानवाधिकारों को आगे बढ़ाने के लिए सहयोग और बातचीत जरूरी है। इसके विपरीत, मुद्दों का राजनीतिकरण, चुनिंदा कार्रवाई और दोहरे मापदंड इस उद्देश्य को कमजोर करते हैं।

मंगलानंदन ने कहा कि परिषद को अपनी भूमिका प्रभावी ढंग से निभाने और मानवाधिकारों के राजनीतिक इस्तेमाल से जुड़े सवालों का जवाब देने के लिए निष्पक्षता को प्राथमिकता देनी होगी। गौरतलब है कि भारत 2026-28 के कार्यकाल के लिए सातवीं बार संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद का सदस्य चुना गया है।

निष्पक्षता से ही कायम रहेगी मानवाधिकार परिषद की साख

भारतीय प्रतिनिधि ने कहा कि परिषद की विश्वसनीयता इस बात से तय होगी कि वह सभी देशों के साथ एक जैसा व्यवहार करती है या नहीं। किसी देश की सहमति और भागीदारी के बिना उसके संबंध में विशेष जनादेश निर्धारित करने से जमीनी स्तर पर सकारात्मक बदलाव लाना मुश्किल है। इसके बजाय ऐसी प्रक्रियाएं परिषद के सदस्यों के बीच मतभेद बढ़ा सकती हैं।

उन्होंने सार्वभौमिक आवधिक समीक्षा (Universal Periodic Review) को मानवाधिकारों से जुड़े मुद्दों पर चर्चा का बेहतर माध्यम बताया। उनके अनुसार, यह व्यवस्था सभी देशों को समान आधार पर रखती है और आपसी सहयोग तथा संबंधित देशों के साथ रचनात्मक संवाद को प्रोत्साहित करती है।

आतंकवाद मानवाधिकारों के लिए गंभीर खतरा

भारत ने अपने संबोधन में आतंकवाद को भी मानवाधिकारों के सामने मौजूद सबसे बड़े खतरों में शामिल बताया। विशेष रूप से जीवन के अधिकार पर इसके गंभीर प्रभाव का उल्लेख करते हुए मंगलानंदन ने परिषद से आतंकवाद के खिलाफ लगातार और प्रभावी रुख अपनाने की मांग की।

उन्होंने कहा कि आतंकवाद के प्रति किसी भी तरह की नरमी नहीं बरती जानी चाहिए और मानवाधिकार परिषद को इस चुनौती पर लगातार ध्यान देना चाहिए।

सभी तरह के मानवाधिकारों को मिले समान महत्व

भारत ने इस बात पर भी जोर दिया कि मानवाधिकारों को अलग-अलग श्रेणियों में बांटकर उनकी अहमियत कम या ज्यादा नहीं आंकी जानी चाहिए। आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों के साथ विकास के अधिकार को भी नागरिक एवं राजनीतिक अधिकारों के बराबर महत्व मिलना चाहिए।

मंगलानंदन ने कहा कि विकासशील देशों में गरीबी, बढ़ता कर्ज और वित्तीय संसाधनों तथा आधुनिक तकनीक तक सीमित पहुंच मानवाधिकारों से जुड़ी समस्याओं के प्रमुख कारण हैं। इन चुनौतियों से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहयोग और सहायता की आवश्यकता है, न कि दबाव बनाने या जबरन फैसले थोपने की।

संयुक्त राष्ट्र की संस्थाओं के बीच दोहराव से बचने की अपील

भारत ने मानवाधिकार परिषद को अपने निर्धारित संसाधनों के दायरे में रहकर काम करने की सलाह भी दी। भारतीय प्रतिनिधि ने कहा कि परिषद और संयुक्त राष्ट्र महासभा के बीच एक जैसे विषयों पर बार-बार प्रस्ताव लाने और समान पहल दोहराने से बचने के लिए प्रभावी व्यवस्था विकसित की जानी चाहिए।

उन्होंने इस प्रवृत्ति पर चिंता जताई कि मानवाधिकार परिषद की ओर से महासभा की तीसरी समिति को अधिकाधिक रिपोर्ट भेजी जा रही हैं। इनमें विशेष प्रतिवेदकों की रिपोर्ट भी शामिल हैं। भारत का मानना है कि इस तरह की व्यवस्था से मानवाधिकार परिषद की विशिष्ट विशेषज्ञ भूमिका प्रभावित हो सकती है।

उल्लेखनीय है कि संयुक्त राष्ट्र महासभा की तीसरी समिति सामाजिक, मानवीय और सांस्कृतिक मुद्दों से जुड़े विषयों पर विचार करती है। भारत ने अपने रुख के जरिए स्पष्ट किया कि मानवाधिकारों की रक्षा के लिए निष्पक्षता, समानता, आपसी सहयोग और सभी देशों की भागीदारी को आधार बनाया जाना चाहिए।

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