UNEP: संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) की हालिया रिपोर्ट में सामने आया है कि दुनिया 1.5 डिग्री सेल्सियस वैश्विक तापमान वृद्धि की सीमा को पार करने के बेहद करीब पहुंच गई है और 50 सालों की प्रौद्योगिकी तरक्की भी जलवायु परिवर्तन को उलट नहीं सकती।
रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि आने वाले कुछ सालों में वैश्विक तापमान पूर्व-औद्योगिक स्तर की तुलना में 1.5 डिग्री सेल्सियस की ताप वृद्धि सीमा को अस्थायी रूप से पार कर जाएगा। रिपोर्ट में कहा गया है कि इससे पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुंचने के साथ छोटे द्वीपीय विकासशील देशों के जलमग्न होने का खतरा भी बढ़ सकता है। रिपोर्ट में ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कटौती पर जोर दिया गया है। रिपोर्ट में दक्षिण एशिया जैसे विकासशील क्षेत्रों पर जलवायु परिवर्तन के असर का जिक्र भी है।
यूएनईपी भारत प्रमुख बालकृष्ण पशुपति ने बताया कि “अगर हम दक्षिण एशिया जैसे क्षेत्र की बात करें, तो ये बहुत अहम हो जाता है क्योंकि इसे कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। चाहे वह आबादी का दबाव हो, आय में असमानता हो, टेक्नोलॉजी तक असमान पहुंच हो या फिर ‘जस्ट ट्रांजिशन’ (न्यायपूर्ण बदलाव) की समस्या हो। असल में, दक्षिण एशिया भी उन कई विकासशील देशों की तरह ही है जो ग्लोबल वार्मिंग का सबसे ज्यादा असर झेल रहे हैं। इनमें से कई बदलाव देशों की राजनीतिक सीमाओं तक सीमित नहीं रहेंगे; ये उनसे कहीं आगे तक फैले हुए हैं। इसीलिए हमारे पास बहुपक्षीय प्रक्रियाएं, बातचीत और यूएन फ्रेमवर्क कंवेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज जैसे फ्रेमवर्क मौजूद हैं।”
यूएनईपी के भारत प्रमुख ने कहा कि कई जलवायु ‘घड़ियां’ एक साथ चल रही हैं और हर एक की अपनी गति और समय-सीमा है। उन्होंने कहा कि ग्लोबल वार्मिंग की रफ्तार को धीमा किया जा सकता है लेकिन ग्लेशियर, समुद्र का जलस्तर, इकोसिस्टम और लोग, इन बदलावों पर अलग-अलग समय-सीमा में प्रतिक्रिया देते हैं। इनमें से कई बदलाव ऐसे हैं जो एक बार शुरू हो जाएं, तो ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम होने पर भी उन्हें पलटा नहीं जा सकेगा।
“अगर हम ‘हीट क्लॉक’ (गर्मी बढ़ने की घड़ी) का उदाहरण लें, तो जैसे ही हम गर्मी को कम कर पाते हैं, उसका असर तुरंत महसूस और देखा जा सकता है लेकिन ‘ग्लेशियर क्लॉक’ (ग्लेशियर पिघलने की प्रक्रिया) के मामले में स्थिति अलग है; सौ साल बाद भी, अगर तापमान गिरकर 1.2, 1.3 या 1.5 डिग्री सेल्सियस या उससे भी कम हो जाता है, तो भी ऐसा नहीं होगा कि ग्लेशियर फिर से बन जाएं, बर्फ की परतें (आइस कैप्स) वापस आ जाएं और सब कुछ 1800 या 1900 के दशक जैसा सामान्य हो जाए। ऐसा इसलिए है क्योंकि ग्लेशियर इन बदलावों पर दूसरे सिस्टम से काफी हद तक स्वतंत्र रूप से प्रतिक्रिया करते हैं।”
इसका सीधा असर हिंदू कुश हिमालय पर पड़ेगा; ये वो पहाड़ी इलाका है जो उन नदियों को पानी देता है जिन पर दक्षिण एशिया के लगभग दो अरब लोग निर्भर हैं। इस पर रिसर्च करने वाले वैज्ञानिकों का कहना है कि तापमान बढ़ने के साथ बर्फ की मोटाई में काफी कमी आने की आशंका है, जबकि चोटियों पर बर्फ और ग्लेशियर के दोबारा बनने में कई साल लग सकते हैं, भले ही बाद में तापमान कम हो जाए।
आईसीआईएमओडी के सीनियर क्रायोस्फेयर स्पेशलिस्ट फारूक आजम ने कहा कि “अभी के माहौल में तापमान ऐसा है कि कुछ समय तक और ग्लेशियर पिघलते रहेंगे। अगर हम तापमान को कम करने में कामयाब हो जाते हैं, तो हालात बदल सकते हैं; हमें ज्यादा ठोस रूप में बारिश (जैसे बर्फबारी) मिल सकती है, ग्लेशियर का नुकसान कम हो सकता है। अगर हम अभी से दुनिया को डीकार्बोनाइज करने की दिशा में गंभीरता से कोशिशें शुरू करते हैं, तो उत्सर्जन को कंट्रोल करके पुराने तापमान को वापस लाने में कुछ दशक लग जाएंगे।”))
यूएनईपी की रिपोर्ट बराबरी और निष्पक्षता के मुद्दों को उठाती है और ‘साझा लेकिन अलग-अलग जिम्मेदारियां’ जैसी अवधारणाओं की ओर इशारा करती है। ये सिद्धांत मानता है कि जिन देशों ने ऐतिहासिक रूप से सबसे ज्यादा उत्सर्जन किया है, उनकी ये बड़ी जिम्मेदारी है कि वो उन देशों की मदद करें जो अब इसके नतीजों का सामना कर रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि दक्षिण एशिया के देशों के लिए ये रिपोर्ट याद दिलाती है कि इन वादों को अब जमीनी स्तर पर अमल में लाना होगा।