उत्तरकाशी में मंगसीर की बग्वाल की धूम, दीपावली के एक माह बाद मनाई जाती है मंगसीर की बग्वाल

जनपद उत्तरक़ाशी में दीपावली के एक माह बाद मनाए जाने वाली मंगसीर की बग्वाल की धूम है। मंगलवार देर रात तक कई गांव में ग्रामीण पारंपरिक बग्वाल में भैलो घुमाते नजर आए। तस्वीरे मांडियासारी गांव की है जहां देर रात तक ग्रामीण भैलो घुमाते नजर आए। बता दे कि यहां ग्रामीण मंगसीर की बग्वाल को तीन दिन तक मनाते है। आज रात को पहाड़ पर इस बड़ी बगवाल का भव्य रूप देखने को मिलेगा। पहाड़ की इस खास दीपावली यानि बग्वाल को मनाने के लिए अन्य राज्यों में रह रहे प्रवासी भी बड़ी संख्या में गांव पहुँचे हुए हैं। इतिहास के जानकार बताते हैं कि मंगशीर की बग्वाल गढ़वाली सेना की तिब्बत विजय का उत्सव है।

क्यों मानते हैं मंगसीर बग्वाल :-

उत्तराखंड के वीर भड़ो , माधो सिंह भंडारी और लोदी रीखोला के तिब्बत युद्ध जीत कर आने की खुशी में मनाई जाती है। मंगसीर बग्वाल सन 1632 में गढ़वाल नरेश महिपत शाह के शाशन काल मे ,गढ़वाल और तिब्बत सेना के बीच युद्ध हुवा था। गढ़वाल की सेना का नेतृत्व माधो सिंह भंडारी और लोदी रीखोला ने किया था। मुख्य दीवाली को गढ़वाल सेना और गढ़वाल के वीर सेनापति युद्ध मे फसे होने के कारण ,गढ़वाल में मुख्य दीवाली नही मनाई गई। कार्तिक एकादशी को इनके जीत की खुशी में या  वापस आने की खुशी में इगाश मनाई गई। और इनके वापस अपने घर मलेथा आने की खुशी में प्रतिवर्ष मंगसीर बग्वाल मनाई जाती है।

कैसे मानते हैं ,मंगसीर बग्वाल 

पांच दिन तक धूम धाम से मनाये जाने वाला यह त्यौहार संस्कृति संपन्न त्यौहार होता है। मूलतः मंगसीर बग्वाल के नाम से यह पर्व उत्तरकाशी के गंगा घाटी ,जौनपुर ,बूढ़ा केदार आदि क्षेत्रों में मनाया जाता है। इसे बाड़ाहाट की बग्वाल के नाम से भी जाना जाता है। यह पर्व मुख्यतः पांच दिन तक मानाया जाता है।

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