Hockey: ‘चक दे! इंडिया’ ने जगाया आदित्य का हॉकी का सपना, अब विश्व कप में गोल करने पर नजर

Hockey:  शाहरुख खान की फिल्म ‘चक दे! इंडिया’ से प्रेरित होकर, भारतीय पुरुष हॉकी टीम के फॉरवर्ड आदित्य अर्जुन ने बचपन में कई खेलों में से हॉकी को चुना। अब उन्हें उम्मीद है कि उनकी रफ्तार और हुनर विश्व कप में नेशनल टीम को गोल करने में मदद करेंगे। आदित्य ने अपने खेल का सफर अपने गांव में अपनी बड़ी बहन के साथ दौड़ने से शुरू किया था। उन्होंने बताया कि पुणे एकेडमी में चुने जाने के बाद खेल चुनने के मौके ने उनकी जिंदगी बदल दी।

“मैं दूसरी क्लास में था और हमारे गांव में दौड़ने की प्रतियोगिताएं होती थीं। मेरी बहन दौड़ती थी और मैं उसके पीछे-पीछे दौड़ता था। मेरा चयन पुणे एकेडमी में हो गया, लेकिन मेरी बहन का नहीं। वहां कई खेल थे और मुझे उनमें से एक चुनना था।” “वहां जाने से पहले मैंने ‘चक दे! इंडिया’ देखी थी और मुझे हॉकी पसंद थी, इसलिए मैंने हॉकी चुनी।”

भारतीय महिला टीम के शुरुआती संघर्ष से लेकर आखिरकार मिली कामयाबी तक के सफर को दिखाने वाली इस फिल्म का युवा फॉरवर्ड पर गहरा असर पड़ा। उन्होंने कहा, “उस फिल्म ने मुझे प्रेरित किया। टीम शुरू में हारती थी लेकिन अंत में जीत जाती थी। मुझे वह फिल्म देखना अच्छा लगा।” अब भारतीय टीम का हिस्सा बन चुके आदित्य का मानना ​​है कि उनकी रफ्तार और हुनर ​​टीम के लिए फायदेमंद साबित हो सकते हैं।

उन्होंने कहा, “मैं टीम के लिए गोल कर सकता हूं। मेरी रफ्तार और हुनर ​​टीम की मदद कर सकते हैं।” इस युवा खिलाड़ी ने टीम के माहौल को भी श्रेय दिया, जिससे नए खिलाड़ी जल्दी घुल-मिल जाते हैं। उन्होंने कहा, “यहां का माहौल अच्छा है। कोई सीनियर या जूनियर नहीं है। सब मिल-जुलकर रहते हैं। सीनियर खिलाड़ी जूनियर्स का साथ देते हैं और उनका हौसला बढ़ाते हैं।”

जिन खिलाड़ियों को वह अपना आदर्श मानते हैं, उनमें अनुभवी मिडफील्डर मनप्रीत सिंह भी शामिल हैं। आदित्य उनके अनुशासन और लगन की तारीफ करते हैं। “मनप्रीत बहुत अनुशासित हैं। वह सही डाइट लेते हैं और फिट रहते हैं। वह बहुत मेहनत करते हैं, गोल करते हैं और टीम के अच्छे लीडर हैं। मुझे वह बहुत पसंद हैं।” भारत के लिए विश्व कप और एशियाई खेलों जैसे बड़े टूर्नामेंट होने वाले हैं, लेकिन आदित्य का निजी लक्ष्य बहुत सीधा है।

उन्होंने कहा, “मैं अपनी टीम के लिए गोल करना चाहता हूं।” मैदान के बाहर, उनकी मां ही उन्हें सबसे ज्यादा हिम्मत देती हैं, हालांकि जूनियर दिनों में उन्हें चोटिल होते देखने के बाद से वह अब उनके मैच नहीं देखतीं। “मेरा पूरा परिवार मैच देखता है, लेकिन मेरी मां नहीं देखतीं। जब मैं जूनियर था, तब वह मैच देखती थीं, लेकिन एक बार मैं गिर गया था और मुझे चोट लग गई थी। तब से उन्हें डर लगता है।”

हालांकि, हर हार के बाद वह सबसे पहले फोन करने वालों में से एक होती हैं। आदित्य ने कहा, “वह मुझसे कहती हैं कि मैंने अच्छा खेला और इससे मुझे अच्छा लगता है।”

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