Suvendu Adhikari: ममता के भरोसमेंद सहयोगी से विरोधी तक कैसा रहा शुभेंदु अधिकारी का राजनीति सफर

Suvendu Adhikari: तृणमूल कांग्रेस के कभी ‘पोस्टर ब्वॉय’ और नंदीग्राम में ममता बनर्जी के भूमि अधिग्रहण विरोधी आंदोलन का प्रमुख चेहरा रहे शुभेंदु अधिकारी का भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) में शामिल होना और एक दुर्जेय प्रतिद्वंद्वी के रूप में उभरना जितना नाटकीय है, उतना ही उल्लेखनीय भी है।

शुभेंदु ने न केवल नंदीग्राम में ममता के खिलाफ फिर से जीत हासिल की, बल्कि उन्हें 2021 के मुकाबले कहीं बड़े अंतर (1,956 की तुलना में 9,665 मतों के अंतर से) से भी हराया। यही नहीं, उन्होंने तृणमूल सुप्रीमो को उनके गढ़ भवानीपुर में भी 15,105 वोट के भारी अंतर से शिकस्त दी, जो एक ऐसे राजनीतिक बदलाव को रेखांकित करता है, जिसकी कल्पना कम ही लोगों ने की होगी।

इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि शुभेंदु की ये दोहरी सफलता, और अपने गढ़ पूर्व मेदिनीपुर की सभी 16 सीट पर तृणमूल की करारी हार और बीजेपी की जीत सुनिश्चित करना, उन्हें राज्य के मुख्यमंत्री पद का सबसे प्रबल दावेदार बनाता है। हालांकि बीजेपी ने घोषणा की थी कि उसका मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार वो व्यक्ति होगा, जो बंगाल में जन्मा और पला-बढ़ा हो और जिसने बांग्ला माध्यम में शिक्षा हासिल की हो, लेकिन पार्टी ने इस पद के लिए अभी तक शुभेंदु या किसी दूसरे नेता का नाम आधिकारिक तौर पर घोषित नहीं किया है।

दिलचस्प बात ये है कि शुभेंदु उन सभी कसौटी पर खरे उतरते हैं, जिनका जिक्र केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने चुनाव प्रचार के दौरान मुख्यमंत्री पद के लिए चेहरे में वांछित बताई थी। एक समय में ममता के सबसे करीबी सहयोगियों में शुमार शुभेंदु आज उनके लिए संभवत: सबसे दुर्जेय प्रतिद्वंद्वी के रूप में उभरे हैं। इस प्रक्रिया में उन्होंने न केवल अपने सियासी भविष्य को नया आकार दिया, बल्कि शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व का विश्वास भी जीता।

बंगाल के राजनीतिक परिदृश्य में शुभेंदु का उभरना उनकी आक्रामक शैली और कानून-व्यवस्था, घुसपैठ और तृणमूल कांग्रेस के शासन में “भ्रष्टाचार” जैसे मुद्दों पर उनके मजबूत रुख पर आधारित है। उन्होंने अपने शुरुआती राजनीतिक जीवन का अधिकांश समय मुख्य रूप से कृषि प्रधान पूर्व मेदिनीपुर जिले के तटीय और औद्योगिक क्षेत्रों में दबदबा कायम करने में बिताया। हालांकि, 2020 में वे तृणमूल कांग्रेस से अलग हो गए।

शुभेंदु का बीजेपी में शामिल होना बंगाल की राजनीति में एक बड़ा मोड़ साबित हुआ और वे जल्द ही राज्य में पार्टी के सबसे प्रमुख नेताओं में से एक के रूप में स्थापित हो गए। शुभेंदु का सबसे बड़ा राजनीतिक दांव 2021 में नंदीग्राम विधानसभा क्षेत्र में ममता को चुनौती देना था, जहां उनकी जीत ने उन्हें पूरे राज्य लोकप्रियता दिलाई। उस जीत ने न केवल दशकों से इस क्षेत्र में राजनीतिक रूप से सक्रिय शुभेंदु परिवार के प्रभुत्व को मजबूत किया, बल्कि उनके बड़े बेटे को राज्य विधानसभा में विपक्ष के नेता के पद तक भी पहुंचाया।

बीजेपी की विचारधाराओं के अनुरूप ढलने और भविष्य में पार्टी में अहम पद हासिल करने के लिए शुभेंदु ने भूमि अधिग्रहण आंदोलन के एक समावेशी नेता से अपनी छवि को हिंदुत्व ब्रिगेड के प्रतीक के रूप में बदलने का काम किया। उन्होंने दावा किया कि अगर तृणमूल चुनाव जीतती है, तो वे “पश्चिम बंगाल को पूर्वी बांग्लादेश बना देगी।” अपने प्रारंभिक वर्षों के दौरान आरएसएस की शाखाओं में प्रशिक्षित शुभेंदु ने 1980 के दशक के अंत में कांग्रेस के छात्र संगठन ‘छात्र परिषद’ के सदस्य के रूप में राजनीति में कदम रखा।

उन्होंने 1995 में पहली बार चुनावी राजनीति में किस्मत आजमाई और कांथी नगरपालिका के पार्षद चुने गए, जिसका नेतृत्व उनके पिता शिशिर अधिकारी ने 1967 से 2009 तक किया था। शुभेंदु 1999 में अपने पिता के साथ तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए। इसके बाद उन्होंने दो बार चुनाव लड़ा, लेकिन दोनों बार असफल रहे – 2001 के विधानसभा चुनाव और 2004 के लोकसभा चुनाव में। अंततः शुभेंदु को 2006 में सफलता मिली, जब उन्होंने कोंटाई विधानसभा सीट जीती। साल 2007 में नंदीग्राम में हुए कृषि भूमि अधिग्रहण विरोधी आंदोलन ने बंगाल के राजनीतिक परिदृश्य को बदल दिया और शुभेंदु को तृणमूल की अग्रणी पंक्ति में ला खड़ा किया।

शुभेंदु जल्द ही तृणमूल के ‘कोर ग्रुप’ के सदस्य बन गए और उन्हें पार्टी की युवा कांग्रेस का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। 2009 और 2014 में उन्होंने तामलुक से लोकसभा चुनाव जीता। ममता के 2011 में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बनने के बाद ज्यादातर लोगों ने शुभेंदु को उनके उत्तराधिकारी के रूप में देखा। हालांकि, दोनों नेताओं के बीच अविश्वास का बीजारोपण उसी साल 21 जुलाई को तृणमूल की पहली वार्षिक शहीद दिवस रैली में हुआ, जब ममता ने अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी के राजनीति में प्रवेश की घोषणा की।

उस समय मात्र 24 साल के अभिषेक को तृणमूल कांग्रेस की युवा इकाई का अध्यक्ष बनाया गया जो टीएमसी युवा कांग्रेस के समानांतर संगठन था। इस फैसले से अधिकारी बेहद नाराज थे, क्योंकि पार्टी के संविधान में दो युवा संगठनों के लिए कोई जगह नहीं थी। साल 2014 में शुभेंदु को तृणमूल युवा कांग्रेस के अध्यक्ष पद से हटा दिया गया और कुछ महीनों बाद इस संगठन का युवा कांग्रेस में विलय कर दिया गया।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *