Diwali: दिवाली से पहले मंदसौर में दीये बनाने की बढ़ी रफ्तार, महंगाई और चीनी उत्पादों के बीच परंपरा बचाने में जुटे कुम्हार

Diwali: दिवाली का त्योहार नजदीक आते ही मध्य प्रदेश के मंदसौर में मिट्टी के दीये बनाने वाले कारीगरों ने काम तेज कर दिया है। घरों को रोशन करने वाले इन पारंपरिक दीपों को तैयार करने के लिए कुम्हार परिवार दिन-रात मेहनत कर रहे हैं। सीमित रोशनी वाले अपने कामकाजी स्थानों पर वे मिट्टी को आकार देकर एक-एक दीया तैयार करने में जुटे हैं।

हालांकि, दीये बनाने का यह पारंपरिक काम अब कारीगरों के लिए पहले जितना आसान और फायदेमंद नहीं रह गया है। उनका कहना है कि मिट्टी की खरीद, उसे लाने और ढुलाई पर होने वाला खर्च लगातार बढ़ रहा है। इसके अलावा दीये तैयार करने में काफी शारीरिक मेहनत लगती है, लेकिन इसके मुकाबले उनकी आमदनी में कोई खास इजाफा नहीं हुआ है।

पांच से सात सदस्य मिलकर तैयार करते हैं दीये

मिट्टी के दीये बनाने की प्रक्रिया में परिवार के कई सदस्य मिलकर योगदान देते हैं। मिट्टी को तैयार करने और दीयों को आकार देने से लेकर उन्हें धूप में सुखाने तथा भट्ठी में पकाने तक अलग-अलग चरणों में पांच से सात लोग काम करते हैं।

यह काम केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि कई परिवारों के लिए पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा भी है। आर्थिक चुनौतियों के बावजूद अनेक कारीगर इस पारंपरिक हुनर को आगे बढ़ाने में लगे हुए हैं।

चीनी उत्पादों और घटती मांग से बढ़ी मुश्किलें

पारंपरिक मिट्टी के दीयों को बाजार में चीन से आने वाले सजावटी उत्पादों से भी प्रतिस्पर्धा करनी पड़ रही है। कारीगरों के मुताबिक, बाजार में मांग कम होने और सरकारी सहायता तक सीमित पहुंच के कारण उनकी आर्थिक स्थिति पर दबाव बढ़ा है।

बढ़ती उत्पादन लागत और कमाई में अपेक्षित बढ़ोतरी नहीं होने से इस पेशे से जुड़े परिवारों के सामने रोजी-रोटी के साथ अपनी पारंपरिक कला को बचाए रखने की चुनौती भी है।

परंपरा और आजीविका दोनों बचाने की कोशिश

दिवाली के करीब आते ही मंदसौर के कुम्हार परिवारों की व्यस्तता बढ़ गई है। तमाम मुश्किलों के बावजूद वे त्योहार के लिए मिट्टी के दीये तैयार करने में जुटे हैं। उनके लिए यह सिर्फ बाजार की मांग पूरी करने का काम नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही कला और विरासत को जिंदा रखने की कोशिश भी है।

कारीगरों की मेहनत से तैयार ये मिट्टी के दीपक हर साल दिवाली पर घरों और आंगनों को रोशन करते हैं। ऐसे में इन परिवारों के लिए इस परंपरागत पेशे को जारी रखना और त्योहार के दौरान ग्राहकों की जरूरत पूरी करना, दोनों ही अहम हैं।

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