Uttarakhand: देश के 51 सिद्ध पीठों में शुमार मां कुंजापुरी मंदिर में मां के दर्शनों के लिए लगा श्रद्धालुओं का तांता

Uttarakhand: मां कुंजापुरी सिद्ध पीठ को देश के प्रमुख सिद्ध पीठों में शुमार किया जाता है, नवरात्र पर्व के लिए माता कुंजापुरी के मंदिर को भव्य रूप से सजाया गया है।

मां कुंजापुरी के दर्शनों के लिए, आस्थावान श्रद्धालुओं को ऋषिकेश से 16 किलोमीटर दूर नरेंद्र ऐतिहासिक शहर पड़ता है, इस शहर को टिहरी के महाराजा नरेंद्र शाह ने 1924 में बसाया था, टिहरी का जिला मुख्यालय रहा इस शहर की प्राकृतिक छटा देखते ही बनती है यह स्वच्छ सुंदर व रमाणिक हिल स्टेशनों में सोमवार किया जाता है, यहां से 7 किलोमीटर की दूरी पर हिंडोला खाल हिल स्टेशन है, यहां पर मां कुंजापुरी का भक्त वीर सौंराल्या़ का मंदिर है, यहां पर श्रद्धालु माथा टेकते हैं और सौंराल्या़ का दर्शन करते हैं, यहीं से 4 किलोमीटर लिंक रोड सिद्ध पीठ कुंजापुरी के लिए जाती है,

इस तरह से योग नगरी ऋषिकेश से मां कुंजापुरी के दर्शनों के लिए, छोटे बड़े वाहनों के जरिए केवल 27 किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती है

यह मंदिर समुद्र तल से 6, 300 फीट की ऊंचाई पर विद्यमान है इस सुप्रसिद्ध सिद्ध पीठ का प्राकृतिक सौंदर्य बहुत ही मनोहारी है, घने बांज ,बुरांश व उतुंग पर्वत श्रृंखलाओं के मध्य यह पवित्र स्थल अत्यंत मनोहारी है
यहां का सूर्यास्त का दृश्य, यहां के सौंदर्य में चार चांद लगा देता है। साफ मौसम में हिमालय पर्वत की हिमाच्छादित गगनचुंबी विशाल चोटियां जो उत्तर में स्थित हैं,जैसे बंदर पूंछ 20,700 फुट, गंगोत्री 21,500 फुट,ओगिन 21,200 फीट, सुरकंडा 990 फुट और घंटा कर्ण 8000 फीट ऊंची चोटियों के यहां से दर्शन हो जाते हैं

दक्षिण में मां गंगा के दर्शन के साथ, ऋषिकेश, हरिद्वार, रुड़की, सहारनपुर, शिवालिक पर्वतमाला व देहरादून घाटी दृष्टिगोचर होती है. पूर्व में पौड़ी जनपद की संख्या मनोहर पर्वत मलायें , लक्ष्मण झूला, स्वर्ग आश्रम, गीता भवन, नीलकंठ और मणीकूट पर्वत की मनोहर चोटियां मन को मोहित कर देती हैं. पश्चिम में देहरादून, मंसूरी, चकराता, गीता भवन, स्वर्ग आश्रम आदि स्थानों की रात्रि में चमचमाती विद्युत छटा मन को अत्यंत मनमोहक लगती है

नाम कुंजापुरी सिद्ध पीठ पड़ने का कारण कहा जाता है कि यक्षों के अधिपति के चुनाव में दक्ष प्रजापति प्रत्याशी थे, किंतु उनके दामाद भगवान शंकर ने, उन्हें इस चुनाव में सहयोग नहीं दिया,

चुनाव जीतने के बाद दक्ष प्रजापति ने हरिद्वार के समीप कनखल में एक महायज्ञ का आयोजन किया, इस महायज्ञ में सभी देवताओं को आमंत्रित किया गया किंतु यक्ष ने अपने दामाद शिवजी से नाराज होकर उन्हें आमंत्रित नहीं किया
माता सती बिन बुलाए यज्ञ में भाग लेने कनखल पहुंच गई यार

मां सती को जब अपने पिता के यहां सम्मान नहीं मिला तो वह क्रोधित होकर महायज्ञ कुंड में कूद पड़ी और अपनी आहुति दे दी, अपने गणों से सूचना मिलने पर भगवान शिव कैलाश से उतर कर कनखल पहुंचे और माता सती को कंधे पर उठाकर निकल पड़े। माता सती की दशा पर महादेव का गुस्सा देख ब्रह्मा ने सती के शरीर को नष्ट करने के लिए सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के तीन टुकड़े कर दिए।

उनमें सती का सिर सुरकुट पर्वत पर गिरा जिससे वहां सुरकंडा मंदिर की स्थापना हुई। धड़ चंद्रकूट पर्वत पर गिरा जिससे वहां माता चंद्रबदनी मंदिर की स्थापना हुई और कुंज अर्थात हृदय का भाग हिंडोलाखाल से पांच किमी दूर ऊंची पहाड़ी पर गिरा जिससे वहां पर माता कुंजापुरी मंदिर सिद्ध पीठ की स्थापना हुई

पुजारी जगमोहन भंडारी का कहना है कि नवरात्र पर्व के लिए मां कुंजापुरी के मंदिर का सौंदर्यकरण किया जा रहा है। मां के दर्शन के लिए सालभर श्रद्धालुओं का आवागमन रहता है,नवरात्र के पर्व पर बड़ी संख्या में लोग देवी के दर्शन को पहुंचते हैं। मान्यता है कि कुंजापुरी सिद्ध पीठ स्थान पर मां सती का कुज अर्थात हृदय का भाग गिरा था, हृदय अति दयालु और कोमल होता है.

मान्यता है कि जो भी आस्थावान मैं श्रद्धालु भक्त सच्चे मन से मां के दर्शन कर अभिभूत हो उठता है, मां उसकी मन्नतें मनोकामना पूरा करती है श्रद्धालुओं का कहना है कि वे एक बार नहीं मनोकामना पूर्ण होने पर कई बार मां के दर्शन कर चुके हैं और उनकी मनोकामना पूर्ण होती है

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