Kashmir: जम्मू-कश्मीर में सर्दियों की शुरुआत के साथ ही पारंपरिक कांगड़ी का इस्तेमाल भी शुरू होने लगा है। कश्मीर घाटी में कांगड़ी सदियों से लोगों को ठंड से बचाने का एक प्रमुख साधन रही है। स्थानीय लोग इसका इस्तेमाल न केवल घरों में, बल्कि बाहर जाते समय भी करते हैं। हालांकि, समय के साथ पारंपरिक कांगड़ी की मांग में कमी आने के कारण इससे जुड़े कारीगरों को गंभीर आर्थिक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।
कश्मीर में पारंपरिक कांगड़ी बनाने के लिए उत्तरी कश्मीर का सोपोर और दक्षिणी कश्मीर के कुलगाम जिले का वाकई क्षेत्र विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं। इन दोनों इलाकों में कांगड़ी बनाने की कला पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही है। यहां के कारीगरों द्वारा तैयार की जाने वाली कांगड़ियां पूरी कश्मीर घाटी में मशहूर हैं। हालांकि, इस पारंपरिक हस्तकला से जुड़े कारीगरों की आर्थिक परेशानियों और कांगड़ी के बाजार में कथित गिरावट के कारण इस प्राचीन कला के भविष्य को लेकर चिंताएं बढ़ने लगी हैं।
कांगड़ी बनाने वाले स्थानीय कारीगरों का कहना है कि इस पारंपरिक हस्तकला के लिए उन्हें पूरे साल मेहनत करनी पड़ती है। कांगड़ी बनाने में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल को इकट्ठा करने से लेकर उसे कुशलता और खूबसूरती के साथ तैयार करने तक कई चरणों में काफी समय लगता है। कारीगरों की लगातार मेहनत के बाद एक कांगड़ी तैयार होती है, लेकिन इसके बावजूद उन्हें उचित आमदनी नहीं हो पाती है।
कारीगरों के अनुसार, यह हुनर उन्हें अपने पूर्वजों से विरासत में मिला है और वे कई पीढ़ियों से इस काम से जुड़े हुए हैं। हालांकि, पिछले कई वर्षों से कांगड़ी के बाजार में आई गिरावट के कारण इस पेशे से जुड़े परिवारों की आर्थिक स्थिति प्रभावित हुई है।
कारीगरों का कहना है कि इस काम से इतनी कमाई भी नहीं हो पाती कि उनकी दैनिक मजदूरी तक पूरी हो सके। यही वजह है कि नई पीढ़ी अब इस पारंपरिक पेशे को छोड़कर रोजगार के दूसरे विकल्प तलाशने के लिए मजबूर हो रही है। यदि यही स्थिति बनी रही, तो कांगड़ी बनाने की यह प्राचीन हस्तकला भविष्य में और भी मुश्किलों का सामना कर सकती है।
स्थानीय कारीगरों ने शिकायत की है कि अब तक सरकार या प्रशासन की ओर से उन्हें कोई पर्याप्त वित्तीय सहायता या मुआवजा उपलब्ध नहीं कराया गया है।
कारीगरों ने सरकार और संबंधित विभागों से अपील की है कि इस पारंपरिक हस्तकला को संरक्षित करने, कारीगरों की आर्थिक स्थिति सुधारने और उनके उत्पादों के बाजार को बढ़ावा देने के लिए प्रभावी कदम उठाए जाएं, ताकि न केवल इन परिवारों का रोजगार सुरक्षित रह सके, बल्कि कश्मीर की यह प्राचीन सांस्कृतिक विरासत भी आने वाली पीढ़ियों तक पहुंच सके।