WPI inflation: ईंधन और खाद्य वस्तुओं की कीमतों में नरमी के बीच थोक मुद्रास्फीति नौ महीने में मासिक आधार पर पहली बार घटकर जुलाई में 9.78 फीसदी रही, आधिकारिक आंकड़ों में ये जानकारी दी गई। थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) पर आधारित थोक मुद्रास्फीति जून के महीने में 9.87 फीसदी रही थी।
अक्टूबर, 2025 के बाद पहली बार थोक महंगाई में मासिक आधार पर गिरावट दर्ज की गई है। जुलाई में गिरावट मुख्य रूप से ईंधन एवं बिजली क्षेत्र की कीमतों में कमी के कारण आई, जबकि प्राथमिक वस्तुओं और विनिर्मित उत्पादों की महंगाई बढ़ी। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय ने कहा कि खनिज तेल (पेट्रोलियम उत्पादों सहित), खाद्य वस्तुएं, मूल धातुओं का विनिर्माण, गैर-खाद्य वस्तुएं, खाद्य उत्पादों का विनिर्माण तथा रसायन एवं रासायनिक उत्पाद जुलाई की थोक महंगाई बढ़ाने वाले प्रमुख कारक रहे।
ईंधन एवं बिजली क्षेत्र की महंगाई जुलाई में घटकर 20.05 फीसदी रह गई, जो जून में 27.41 फीसदी थी। खाद्य वस्तुओं की महंगाई भी मामूली घटकर 5.44 फीसदी रही, जो जून में 5.49 फीसदी थी। हालांकि, विनिर्मित उत्पादों की महंगाई जुलाई में बढ़कर 8.29 फीसदी हो गई, जो जून में 7.48 फीसदी थी।
आंकड़ों के मुताबिक, उत्पादन उत्पादक मूल्य सूचकांक (पीपीआई) में जुलाई में सालाना आधार पर 9.6 फीसदी की महंगाई रही, जो जून के समान स्तर पर है। सरकार ने कहा है कि पीपीआई करीब पांच साल में डब्ल्यूपीआई की जगह ले लेगा। उत्पादन पीपीआई में विनिर्माण और खनन क्षेत्र की महंगाई कम हुई, लेकिन कृषि और बिजली क्षेत्र में महंगाई बढ़ने से इसका असर निष्प्रभावी हो गया।
बार्कलेज ने एक शोध रिपोर्ट में कहा कि थोक मुद्रास्फीति की दिशा बदल गई है और आने वाले महीनों में इसमें नरमी आनी चाहिए, क्योंकि वैश्विक कीमतें संभवतः अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच चुकी हैं। बार्कलेज ने कहा, ‘‘हमारे विचार में थोक मुद्रास्फीति अपने चरम पर पहुंच चुकी है और इसके बाद धीरे-धीरे और मामूली गिरावट जारी रहनी चाहिए।’’ उसने कहा कि यह सामान्य तौर पर अपेक्षाकृत कम वैश्विक जिंस कीमतों और खासकर जून के बाद कच्चे तेल की कीमतों में नरमी के अनुरूप होगा।
28 फरवरी से शुरू पश्चिम एशिया संघर्ष और इसके बाद होर्मुज जलडमरूमध्य की नाकेबंदी ने वैश्विक कच्चे तेल और उर्वरक कीमतों पर दबाव बनाए रखा है। भारत अपने कच्चे तेल के आयात का बड़ा हिस्सा इस मार्ग से करता है। रेटिंग एजेंसी आईसी्आरए के मुख्य अर्थशास्त्री राहुल अग्रवाल ने कहा कि जुलाई में थोक महंगाई में नरमी व्यापक नहीं थी और यह पूरी तरह ईंधन एवं बिजली समूह के कारण आई। जून की तुलना में अन्य सभी समूहों में महंगाई बढ़ी है।
उन्होंने कहा कि अगस्त माह के दौरान थोक मुद्रास्फीति में अधिक नरमी आने और इसके 9.5 फीसदी से नीचे रहने का अनुमान है। मई-जून 2026 में यह 9.9 फीसदी के स्तर पर पहुंच गई थी। हालांकि अग्रवाल ने कहा कि चालू वित्त वर्ष के अधिकांश समय में मुद्रास्फीति ऊंची बनी रहने की संभावना है और वित्त वर्ष 2026-27 में औसत डब्ल्यूपीआई महंगाई करीब 8.5 फीसदी रहने का अनुमान है।
थोक महंगाई के आंकड़े इस सप्ताह की शुरुआत में जारी खुदरा महंगाई के आंकड़ों से अलग तस्वीर पेश करते हैं। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) आधारित खुदरा मुद्रास्फीति जुलाई में बढ़कर 4.45 फीसदी हो गई, जो जून में 4.38 फीसदी थी। इसमें खाद्य कीमतों में वृद्धि की प्रमुख भूमिका रही। भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति ने इस महीने की शुरुआत में नीतिगत दरों को 5.25 फीसदी पर अपरिवर्तित रखा था। केंद्रीय बैंक ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए खुदरा महंगाई पांच फीसदी रहने का अनुमान जताया है।