Baby Do Die Do Review: बिना एक भी डायलॉग बोले छा गईं हुमा कुरैशी,एक्शन और सस्पेंस से भरी फिल्म

Baby Do Die Do : सिनेमाघरों में आलिया भट्ट की ‘अल्फा’ के साथ हुमा कुरैशी की ‘बेबी डू डाई डू’ भी रिलीज हुई है। फिल्म का ट्रेलर एक स्टाइलिश क्राइम-थ्रिलर का वादा करता था, लेकिन क्या यह वादा बड़े पर्दे पर पूरा हो पाता है? जवाब है—आधा हां, आधा नहीं। जहां हुमा कुरैशी अपने दमदार प्रदर्शन से फिल्म को संभालने की पूरी कोशिश करती हैं, वहीं कमजोर कहानी और बिखरा हुआ स्क्रीनप्ले इसकी सबसे बड़ी बाधा बन जाते हैं।

कहानी: अंडरवर्ल्ड की दुनिया में दर्द और बदले की दास्तान

फिल्म की कहानी बेबी कर्माकर हुमा कुरैशी के इर्द-गिर्द घूमती है, जो सुन और बोल नहीं सकती। आम जिंदगी जीने वाली बेबी की असली पहचान मुंबई अंडरवर्ल्ड की एक कॉन्ट्रैक्ट किलर की है। वह अपने बॉस पी.एम. जैन चंकी पांडे के लिए खतरनाक मिशन अंजाम देती है।

हालांकि उसके भीतर अपनी जुड़वा बहन की हत्या का दर्द वर्षों से पल रहा है। कहानी तब नया मोड़ लेती है जब एक बड़े बिल्डर जफर कटकर सिकंदर खेर से जुड़ा असाइनमेंट उसे पुलिस, दुश्मनों और अपने अतीत के बीच फंसा देता है। प्लॉट सुनने में रोमांचक लगता है, लेकिन स्क्रीन पर इसकी पकड़ धीरे-धीरे कमजोर पड़ती जाती है। इंटरवल तक फिल्म उत्सुकता बनाए रखती है, मगर दूसरे हाफ में कहानी अपनी धार खो देती है।

हुमा कुरैशी फिल्म की सबसे बड़ी ताकत

अगर फिल्म देखने की कोई सबसे मजबूत वजह है, तो वह हैं हुमा कुरैशी। बिना किसी डायलॉग के सिर्फ आंखों, चेहरे के भाव और बॉडी लैंग्वेज के जरिए उन्होंने अपने किरदार में जान डाल दी है। कई ऐसे मौके आते हैं जब कहानी लड़खड़ाने लगती है, लेकिन हुमा का प्रदर्शन दर्शकों को जोड़े रखता है।

चंकी पांडे अपने ग्रे-शेड किरदार में प्रभावशाली हैं और स्क्रीन पर अलग ऊर्जा लेकर आते हैं। सिकंदर खेर का किरदार कागज पर जितना खतरनाक दिखाई देता है, पर्दे पर उतना असर नहीं छोड़ पाता। सहायक कलाकारों का काम ठीक है, लेकिन कमजोर लेखन के कारण उन्हें चमकने का पर्याप्त मौका नहीं मिलता।

स्टाइल शानदार, लेकिन कहानी पीछे छूट गई

निर्देशक नचिकेत सामंत ने फिल्म को बेहद स्टाइलिश अंदाज में पेश किया है। कई फ्रेम आकर्षक हैं, एक्शन सीक्वेंस प्रभावी हैं और मुंबई को नए अंदाज में दिखाने की कोशिश की गई है। फिल्म में ‘जॉन विक’ और कोरियन नोयर सिनेमा का प्रभाव साफ नजर आता है।

समस्या तब शुरू होती है जब फिल्म अपनी विजुअल स्टाइल पर जरूरत से ज्यादा निर्भर हो जाती है। शानदार कैमरा वर्क और नियॉन लाइट्स के बीच कहानी धीरे-धीरे पृष्ठभूमि में चली जाती है। दर्शक सिर्फ खूबसूरत फ्रेम नहीं, बल्कि मजबूत कहानी भी चाहते हैं, और यही कमी फिल्म को कमजोर बनाती है।

अच्छी शुरुआत के बाद रफ्तार खो देती है फिल्म

फिल्म का शुरुआती हिस्सा काफी दिलचस्प है। किरदारों का परिचय, रहस्य और अंडरवर्ल्ड की दुनिया दर्शकों को बांधकर रखती है। लेकिन कहानी बहुत जल्दी अपने बड़े राज खोल देती है। इसके बाद जहां सस्पेंस बढ़ना चाहिए था, वहां घटनाएं दोहराव का शिकार होने लगती हैं।

दूसरा हाफ कई जगह अनावश्यक रूप से लंबा महसूस होता है। डार्क ह्यूमर का इस्तेमाल किया गया है, लेकिन अधिकांश जगह वह प्रभाव छोड़ने में असफल रहता है। नतीजा यह होता है कि फिल्म धीरे-धीरे अपनी ऊर्जा खो देती है।

‘बेबी डू डाई डू’ एक ऐसी फिल्म है जो तकनीकी रूप से प्रभावशाली और विजुअली आकर्षक है, लेकिन मजबूत कहानी के अभाव में पूरी तरह असर छोड़ने में नाकाम रहती है। हुमा कुरैशी का शानदार प्रदर्शन इसे देखने लायक जरूर बनाता है, मगर केवल अभिनय के दम पर फिल्म अपनी कमजोर पटकथा की भरपाई नहीं कर पाती।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *