General Upendra Dwivedi: भारत-चीन सीमा पर हालात भले ही पहले की तुलना में शांत और स्थिर दिखाई दे रहे हों, लेकिन भारतीय सेना किसी भी चुनौती से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार है। अपने कार्यकाल के अनुभव साझा करते हुए निवर्तमान सेना प्रमुख General Upendra Dwivedi ने कहा कि भारत और चीन की सेनाओं के बीच हर साल 1100 से अधिक जमीनी स्तर की बातचीत होती है, जिससे वास्तविक नियंत्रण रेखा पर शांति और स्थिरता बनाए रखने में मदद मिलती है।
उन्होंने बताया कि भारतीय सेना अब पारंपरिक युद्ध की अवधारणा से आगे बढ़कर तकनीक आधारित और मल्टी-डोमेन वॉरफेयर की दिशा में तेजी से काम कर रही है। जनरल द्विवेदी ने ऑपरेशन सिंदूर को अपने कार्यकाल की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक बताया और कहा कि इस अभियान ने भारतीय सेना की संयुक्त, एकीकृत और भविष्य के युद्धों के लिए तैयार क्षमता को साबित किया है।
एलएसी पर स्थिति स्थिर, लेकिन सतर्कता बरकरार
जनरल द्विवेदी के मुताबिक 2024-25 के दौरान भारत और चीन के बीच सैन्य तथा कूटनीतिक स्तर पर कई सकारात्मक पहल हुई हैं। कैलाश मानसरोवर यात्रा की बहाली, सीमा व्यापार को फिर से शुरू करने पर सहमति और लगातार बढ़ती सैन्य वार्ताएं दोनों देशों के रिश्तों में धीरे-धीरे सामान्य स्थिति लौटने का संकेत देती हैं।
उन्होंने कहा कि दोनों देशों की सेनाओं के बीच हॉटलाइन, फ्लैग मीटिंग और कमांडर स्तर की वार्ताओं के अलावा हर साल 1100 से अधिक जमीनी स्तर की बातचीत होती है। इन संवादों का उद्देश्य सीमा पर किसी भी तरह की गलतफहमी को समय रहते दूर करना है। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि एलएसी पर हालात स्थिर जरूर हैं, लेकिन स्थिति अभी भी संवेदनशील बनी हुई है और भारतीय सेना पूरी तरह सतर्क है।
ऑपरेशन सिंदूर ने बदल दी युद्ध की सोच
जनरल द्विवेदी ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर ने यह स्पष्ट कर दिया कि भविष्य के युद्ध केवल टैंकों और पारंपरिक हथियारों से नहीं जीते जाएंगे। ड्रोन, साइबर क्षमता, सुरक्षित संचार नेटवर्क, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मल्टी-डोमेन ऑपरेशन आने वाले समय में निर्णायक भूमिका निभाएंगे।
उनके अनुसार इस अभियान के दौरान तीनों सेनाओं के बीच बेहतर समन्वय, सटीक हमले की क्षमता और तकनीक के प्रभावी उपयोग ने भारत की सैन्य ताकत का नया स्वरूप दुनिया के सामने रखा।
सेना में हो रहे हैं बड़े संरचनात्मक बदलाव
भारतीय सेना भविष्य की चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए अपनी संरचना में बड़े बदलाव कर रही है। इसके तहत रुद्र ब्रिगेड, भैरव बटालियन, अशनि ड्रोन प्लाटून, शक्तिबाण रेजिमेंट, दिव्यास्त्र बैटरी और बाज बटालियन जैसी नई इकाइयों का गठन किया जा रहा है।
विशेष रूप से बाज बटालियन का उद्देश्य ड्रोन और रिमोटली पायलटेड एयरक्राफ्ट क्षमता को मजबूत करना है। इन नई इकाइयों के जरिए निगरानी, खुफिया जानकारी जुटाने और युद्धक्षेत्र की रियल-टाइम तस्वीर हासिल करने की क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि होगी।
अग्निपथ योजना पर क्या बोले सेना प्रमुख?
अग्निपथ योजना को लेकर जनरल द्विवेदी ने कहा कि यह भारतीय सेना को अधिक युवा, फिट और तकनीक-सक्षम बनाने की दिशा में एक बड़ा सुधार है।
उन्होंने बताया कि अग्निवीरों को लेकर सेना का शुरुआती अनुभव सकारात्मक रहा है। युवा सैनिक नई तकनीकों को तेजी से सीख रहे हैं और आधुनिक युद्ध की जरूरतों के अनुरूप खुद को ढाल रहे हैं। ड्रोन संचालन, निगरानी प्रणाली, संचार नेटवर्क और तकनीक आधारित अभियानों में उनकी भूमिका लगातार बढ़ रही है।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अग्निपथ योजना अभी शुरुआती चरण में है और इसका निरंतर मूल्यांकन किया जा रहा है। भविष्य में किसी भी बदलाव का फैसला सेना की परिचालन जरूरतों और जमीनी अनुभव के आधार पर किया जाएगा।
आत्मनिर्भरता अब राष्ट्रीय सुरक्षा की अनिवार्यता
जनरल द्विवेदी ने जोर देकर कहा कि आत्मनिर्भरता अब केवल सरकारी नीति नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा की बुनियादी जरूरत बन चुकी है। युद्ध या संकट की स्थिति में भारत को हथियारों, गोला-बारूद और सैन्य तकनीक के लिए बाहरी देशों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए।
उन्होंने बताया कि भारतीय सेना स्वदेशी ड्रोन, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणालियों, आधुनिक संचार नेटवर्क और एआई आधारित सैन्य तकनीकों को तेजी से अपनाने की दिशा में काम कर रही है। सेना, DRDO, निजी उद्योगों, स्टार्टअप्स और शैक्षणिक संस्थानों के साथ मिलकर भविष्य की चुनौतियों के लिए खुद को तैयार कर रही है।
मुख्य बातें
- भारत और चीन की सेनाओं के बीच हर साल 1100 से अधिक जमीनी स्तर की बातचीत।
- एलएसी पर स्थिति स्थिर, लेकिन संवेदनशील; सेना पूरी तरह सतर्क।
- ऑपरेशन सिंदूर ने तकनीक आधारित युद्ध क्षमता को प्रदर्शित किया।
- ड्रोन, साइबर वॉरफेयर और मल्टी-डोमेन ऑपरेशन पर बढ़ा फोकस।
- रुद्र ब्रिगेड, भैरव बटालियन और बाज बटालियन जैसी नई सैन्य इकाइयों का गठन।
- अग्निपथ योजना को सेना ने भविष्य की जरूरतों के अनुरूप बड़ा सुधार बताया।
- आत्मनिर्भर रक्षा उत्पादन को राष्ट्रीय सुरक्षा की अनिवार्य शर्त माना गया।