Basant Panchami: भारत में त्योहार केवल परंपरा नहीं, बल्कि आपसी मेल-जोल, आस्था और खुशियों का प्रतीक होते हैं। बसंत पंचमी भी ऐसा ही एक महत्वपूर्ण पर्व है, जो ऋतु परिवर्तन के साथ जीवन में नई ऊर्जा और सकारात्मकता लेकर आता है। इस दिन से वसंत ऋतु का आगमन माना जाता है और प्रकृति चारों ओर हरियाली व पीले रंग की छटा बिखेर देती है।
कब और क्यों मनाई जाती है
हिंदू पंचांग के अनुसार बसंत पंचमी माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाई जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसी दिन भगवान ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना की थी। साथ ही यह भी माना जाता है कि इसी दिन देवी दुर्गा से विद्या, बुद्धि और कला की देवी मां सरस्वती का प्राकट्य हुआ था। यही कारण है कि देश के कई हिस्सों में इस दिन सरस्वती पूजा का विशेष महत्व है।
देशभर में अलग-अलग रूपों में उत्सव
बसंत पंचमी को भारत के विभिन्न राज्यों में अलग-अलग तरीकों से मनाया जाता है। पश्चिम बंगाल, बिहार और झारखंड में यह पर्व सरस्वती पूजा के रूप में धूमधाम से मनाया जाता है। उत्तर भारत, खासकर पंजाब और हरियाणा में इस दिन पतंगबाजी का विशेष चलन है। वहीं राजस्थान में लोग पीले वस्त्र धारण कर और चमेली के फूलों की माला पहनकर इस पर्व को मनाते हैं।
शिक्षा संस्थानों में विशेष आयोजन
स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में बसंत पंचमी का विशेष महत्व है। विद्यार्थी और शिक्षक मां सरस्वती की पूजा कर ज्ञान, एकाग्रता और सफलता की कामना करते हैं। कई शिक्षण संस्थानों में इस अवसर पर सांस्कृतिक कार्यक्रम, संगीत, नृत्य और कविता पाठ का आयोजन किया जाता है। बच्चों की पढ़ाई की शुरुआत (विद्यारंभ संस्कार) भी इसी दिन शुभ मानी जाती है।
पीले रंग का विशेष महत्व
बसंत पंचमी में पीले रंग का खास महत्व होता है। यह रंग समृद्धि, ऊर्जा, प्रकाश और सकारात्मकता का प्रतीक माना जाता है। खेतों में लहलहाती सरसों की पीली फसल वसंत ऋतु के आगमन का संकेत देती है। यही कारण है कि लोग पीले कपड़े पहनते हैं और पीले रंग के व्यंजन बनाते हैं, जो मां सरस्वती का प्रिय रंग भी माना जाता है।
भोग और पारंपरिक व्यंजन
इस दिन मां सरस्वती को पीले रंग के मिष्ठान्न और व्यंजन अर्पित किए जाते हैं। बंगाल और बिहार में बूंदी, लड्डू, खीर और मालपुआ का भोग लगाया जाता है। बंगाल में खिचड़ी, मिश्रित सब्जी, पायेश, संदेश और राजभोग भी विशेष रूप से बनाए जाते हैं। पंजाब में मक्के की रोटी और सरसों का साग प्रमुख व्यंजन है, जबकि उत्तर भारत में केसरिया चावल और हलवा बनाया जाता है। बिहार में दही-चूड़ा, गुड़ और केला भी प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है।
शुभ कार्यों की शुरुआत का दिन
हिंदू परंपरा में बसंत पंचमी को अत्यंत शुभ माना गया है। इस दिन विवाह, गृह प्रवेश, नया व्यवसाय शुरू करना, वाहन खरीदना और अन्य मांगलिक कार्य बिना किसी विशेष मुहूर्त के किए जा सकते हैं। इसे नई शुरुआत और प्रगति का प्रतीक माना जाता है।
सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व
बसंत पंचमी केवल एक पर्व नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति में ज्ञान, कला, संगीत और प्रकृति के सम्मान का उत्सव है। यह दिन हमें सिखाता है कि शिक्षा और संस्कार से ही जीवन में सच्ची प्रगति संभव है।
इस तरह बसंत पंचमी भारत की सांस्कृतिक विविधता, आस्था और उल्लास का सुंदर संगम है, जो हर वर्ष लोगों के जीवन में नई उमंग और आशा का संचार करता है।