Jammu Kashmir: जम्मू-कश्मीर के उरी सेक्टर में नियंत्रण रेखा (LoC) के समीप बसे गांवों—विशेषकर चुरिंडा और थजल, जहां के निवासी सीमा पार से लगातार हो रही गोलीबारी के बीच जान बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इन गांवों की भौगोलिक स्थिति उन्हें सबसे अधिक संवेदनशील बनाती है, जहां कभी भी गोलाबारी शुरू हो सकती है और नागरिकों को जान का जोखिम उठाना पड़ता है।
चुरिंडा और थजल जैसे गांवों में न तो पर्याप्त बंकर हैं और न ही कोई स्थायी सुरक्षा व्यवस्था। गांव के एक निवासी ने बताया कि पूरे गांव में सिर्फ तीन बंकर हैं, जो कि 250 की आबादी वाले गांव के लिए नाकाफी हैं। ये बंकर न केवल संख्या में कम हैं बल्कि ज्यादातर लोगों के घरों से काफी दूर स्थित हैं, जिससे अचानक गोलीबारी की स्थिति में उनमें पहुंच पाना भी मुश्किल हो जाता है। स्कूल जाने वाले बच्चों की सुरक्षा भी एक बड़ा सवाल बन गया है। एक छात्रा ने कहा कि गोलाबारी के समय वे पढ़ाई छोड़कर जान बचाने के लिए भागते हैं। स्कूलों में बंकर नहीं होने के कारण बच्चे डरे-सहमे रहते हैं और उनका ध्यान पढ़ाई में नहीं लग पाता। वह कहती है, “हमेशा डर बना रहता है कि कहीं स्कूल से लौटते समय हम पर कोई हमला न हो जाए।”
एक अन्य छात्र ने बताया, “हम गोलाबारी के समय बुरी तरह डर जाते हैं, और ऐसा लगता है जैसे हमारी जिंदगी कभी भी खत्म हो सकती है।” छात्रों की यह चिंता बताती है कि न केवल उनका शैक्षणिक जीवन प्रभावित हो रहा है, बल्कि उनका मानसिक स्वास्थ्य भी खतरे में है। स्थानीय लोगों की सरकार से मांग है कि उन्हें स्थायी समाधान दिया जाए। उनका कहना है कि यह सिर्फ बंकरों की जरूरत नहीं है, बल्कि एक शांतिपूर्ण जीवन की मांग है। एक ग्रामीण ने कहा, “हम चाहते हैं कि भारत और पाकिस्तान दोनों देश बातचीत करें और इस संघर्ष का समाधान निकालें। हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे सुरक्षित माहौल में बड़े हों।”
LOC के पास बसे इन गांवों के हालात यह दर्शाते हैं कि युद्ध और संघर्ष का सबसे बड़ा प्रभाव आम नागरिकों पर पड़ता है, खासकर उन बच्चों और परिवारों पर, जिनका न कोई अपराध है और न ही कोई राजनीति से लेना-देना। यह समय है जब सरकार को इन सीमावर्ती क्षेत्रों में सुरक्षा ढांचे को मजबूत करना चाहिए—जैसे कि हर घर या स्कूल के पास बंकरों का निर्माण, आपातकालीन चिकित्सा सुविधाएं, और मनोवैज्ञानिक सहायता केंद्र स्थापित करना।