Trump Tariff: अमेरिकी उच्चतम न्यायालय ने ट्रंप के ग्लोबल टैरिफ पर रोक लगाई, आगे क्या होगा

Trump Tariff: अमेरिका के उच्चतम न्यायालय ने डोनाल्ड ट्रंप द्वारा कई देशों के खिलाफ लगाए व्यापक वैश्विक शुल्क को रद्द कर दिया है। अपने फैसले में उसने कहा है कि ट्रंप 1977 के आपातकालीन शक्ति कानून का इस्तेमाल लगभग हर देश पर व्यापक शुल्क लगाने के लिए नहीं कर सकते।

हालांकि इसका मतलब ये नहीं है कि टैरिफ खत्म हो गया है, यह नीति वापसी से ज्यादा एक कानूनी अवरोध है और ट्रंप के पास अब भी विकल्प मौजूद हैं।

सबसे पहला विकल्प है, 1974 के व्यापार अधिनियम की धारा 301 है। ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल में खुद भी इसका आक्रामक रूप से इस्तेमाल चीन के खिलाफ किया है। धारा 301 के तहत लगाए जाने वाले टैरिफ के आकार पर कोई सीमा नहीं है। इनकी वैधता चार साल बाद खत्म हो जाती है, लेकिन इन्हें बढ़ाया जा सकता है। लेकिन प्रशासन के व्यापार प्रतिनिधि को अनुच्छेद 301 के तहत शुल्क लगाने से पहले एक जांच करनी होगी और आमतौर पर एक सार्वजनिक सुनवाई आयोजित करनी होगी।

दूसरा विकल्प जो तेज है, वो है, 1974 के व्यापार अधिनियम की धारा 122। यह व्यापार असंतुलन को दूर करने के लिए, बिना किसी लंबी जांच के 150 दिनों तक 15% तक के अस्थायी टैरिफ लगाने का अधिकार देती है।

तीसरा विकल्प, अमेरिकी व्यापार विस्तार अधिनियम 1962 की धारा 232 है। ये एक ऐसा टूल है, जो राष्ट्रीय सुरक्षा के आधार पर आयात पर टैरिफ लगाने की अनुमति देता है। इस प्रावधान का इस्तेमाल इस्पात, एल्युमीनियम और ऑटो जैसे क्षेत्रों में आयात को विनियमित करने के लिए किया गया है, जिसके लिए अमेरिकी वाणिज्य विभाग द्वारा विस्तृत जांच और रिपोर्ट की आवश्यकता होती है, जो यह निर्धारित करती है कि क्या आयात से राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा है।

और फिर एक वाइल्ड कार्ड है, 1930 के टैरिफ अधिनियम की धारा 338.. ये बड़ी मंदी के समय की शक्ति है, जो प्रक्रिया से जु़ड़ी कम मुश्किलों के साथ 50% तक टैरिफ लगाने की इजाजत देती है।

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