Saudi Arabia: क्या है अब्राहम समझौता, ट्रंप क्यों चाहते हैं कि सऊदी अरब और सीरिया हों शामिल

Saudi Arabia: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सऊदी अरब में सीरिया के अंतरिम राष्ट्रपति अहमद अल-शरा से मुलाकात की और उनसे इजराइल के साथ संबंधों को सामान्य बनाने का आग्रह किया। अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक गलियारे की ये घटना महत्वपूर्ण थी, ट्रंप ने कहा कि अल-शरा अब्राहम समझौते में शामिल होने और इजराइल को मान्यता देने के लिए तैयार हैं। हालांकि सीरिया ने इसकी तस्दीक नहीं की है। ट्रंप ने रियाद में उम्मीद जताई कि सऊदी अरब जल्द अब्राहम समझौते में शामिल होगा और इजराइल को मान्यता देगा। उन्होंने कहा कि ये काम उनके कार्यकाल में ही होगा।

सऊदी अरब अर्से से कहता आया है कि इजराइल को मान्यता 1967 में फिलिस्तीन के गठन के समय तय सीमा को स्वीकार करने से जुड़ा है। अब्राहम समझौता 2020 में अमेरिकी मध्यस्थता से हुआ था। समझौते के बाद इजराइल, संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, सूडान और मोरक्को सहित कई अरब देशों के बीच राजनयिक संबंध सामान्य हुए।

कमर आगा, रक्षा विशेषज्ञ “इस समझौते से अरब देशों का इजराइल के साथ रिश्ता सामान्य हुआ था। इन देशों के बीच कूटनीतिक, राजनैतिक और आर्थिक सहयोग से यहां शांति स्थापित होगी।इसका प्रस्ताव अमेरिका ने रखा था और वही इसकी पैरोकारी कर रहा है। अमेरिका के सबसे भरोसेमंद साथियों में इजराइल एक है। इसलिए इस क्षेत्र से अमेरिका पीछे हट रहा है तो वो भी अपनी सेना पीछे हटाने की योजना बना रहा है। इजराइल से इन देशों के साथ सुरक्षा और सैनिक सहयोग की उम्मीद की जाती है। ये देश कमजोर हैं और सुरक्षा के लिए अमेरिका पर निर्भर हैं। इसलिए ये समझौता इजराइल और अमेरिका के लिए काफी महत्वपूर्ण है।”

अब्राहम समझौते से मध्य-पूर्व की राजनीति में महत्वपूर्ण बदलाव हुआ। समझौते में शामिल देशों ने इजराइल-फिलिस्तीन विवाद की परवाह किए बिना इजराइल को मान्यता दी थी। समझौते का नाम अब्राहम रखा गया, जिन्हें यहूदी, ईसाई और इस्लाम में सम्मान के साथ देखा जाता है। वे तीनों धर्मों को एक सूत्र में बांधते हैं। समझौते का मकसद व्यापार, प्रौद्योगिकी, सुरक्षा और पर्यटन के क्षेत्रों में आपसी सहयोग को बढ़ावा देना और किसी भी खतरे का मिल कर सामना करना था।

ओआरएफ के उप-निदेशक और फेलो कबीर तनेजा ने बताया कि “ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका लंबे समय से रिश्तों को सामान्य करना चाह रहा था। अमेरिका, सऊदी अरब और इजराइल के रिश्ते सामान्य करना चाहता है। ये अब्राहम समझौते का प्रमुख मकसद है, जो आगे बढ़ रहा है। सऊदी अरब आईएमईसी में शामिल है। उदाहरण के लिए, भारत-मध्य पूर्व आर्थिक गलियारा।

ये काफी हद तक इस बात पर निर्भर करता है कि सऊदी अरब और इजराइल के रिश्ते सामान्य हों, ताकि व्यापारिक और कूटनीतिक संपर्क बनें। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप महत्वपूर्ण नतीजे चाहते हैं। इसलिए वे मोहम्मद बिन सलमान के नेतृत्व में सऊदी अरब को इजराइल के साथ रिश्ते बनाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। सऊदी अरब ने स्पष्ट कर दिया है कि इजराइल के साथ इस तरह के किसी भी समझौते पर दस्तखत करना फिलिस्तीनी मुद्दे पर निर्भर है।”

अब्राहम समझौते का महत्व क्षेत्रीय गठबंधनों को नया स्वरूप देना और उनके लिए नए आर्थिक मोर्चे खोलना है। जानकारों का मानना है कि इस समझौते से भारत, मध्य-पूर्व और यूरोप के बीच करीबी सहयोग हो सकता है, जिससे भारत को भी फायदा पहुंच सकता है।

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