जब घायल हुआ हिमालय

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62 के भारत चीन युद्ध पर लिखा गया ये लेख

पचास वर्ष पहले न दिनों को याद करते हुए वो तश्वीर सामने आती है जब चीन के साथ अचानक हुए युद्ध में भारतीय सेना जूझ रही थी। कई जगह उन मोर्चों पर, जहां के बारे में कुछ भी पता नही था दुर्गम ईलाके, बर्फीली चोटियां और हाथ में एक राइफल कोई अरुणाचल प्रदेश में डटा था तो कोई नेफा लद्दाख में। किसी ने पाकिस्तान की सीमा पर मोर्चा ताना हुआ था।

जब राक के अंधेरे में बत्तियां बुझा देने का आदेश होता तो मन में यही बात उठती है कि कितने दिन चलेगा यह युद्ध और कितना खोएगें हम? आजादी की उमंग थी और भारत का मनोबल तो आकाश छू रहा था, लेकिन आंतरिक रुप से वह निर्बल था। सैनिक केवल अपने हौंसले पर ही युद्ध कर रहे थे। 20 अक्टूबर 1962 को चीनी सेना जब लद्दाख और मैकमोहन रेखा इस पार आई तो हम भारतीय उनके हमलों के लिए पूरी तरह तैयार नही थे। एक साथ तीन सेक्टरों पर चीन का आक्रमण हुआ। पश्चिम के चुशूल में रेजांग –ला और पूर्व में तवांग तक चीनी सैनिक आ गये थे। एक युद्ध हुआ और हमें बहुत से सबक दे गया। चीन का हमला पूरी तैयारी के साथ था। भारतीय सेना एकदम अवाक थी। कई जगहों पर सैनिको को एकदम मोर्चे पर उतारा गया, थ्री नॉट थ्री राइफल, पकड़े वह उस चीन का सामान कर रहे थे,जो हम याद करते हैं। स्थितियां बिल्कुल विपरित थी, फिर भी सैनिक अंत तक जूझते रहे।

फौज का महत्व अंग्रेजी समझते थे, लेकिन अंग्रेज जिस हाल में छोड़कर गये फौज वहीं रह गयी, “थ्री नॉट थ्री” से चलने वाली पच्चीस पौंड की गन से भला युद्ध कैसै जीता जाता। सैनिकों के पास बर्फ से बचाव करने वाले कपड़े नही थे, हाथों में दस्तानें और गर्म बूट तक नहीं थे। शहीद हुए सैनिकों में केवल वह ही नहीं थे, जो दुश्मन की गोली से मारे गए। कई सैनिक तूफानी बर्फीले ग्लेशियर में फस गए। कुछ को चीन की सेना ने बंदी बना लिया। तिब्बत के मामले में भी सही रणनीति नहीं बनी। यह वही क्षेत्र था जो भारत-चीन के बीच दीवार बनता था। देखते ही देखते तिब्बत चीन रा हिस्सा बन गया। पहले भारत व तिब्बत के बीच सीमा का आधार परम्परागत था चीन ने मैकमहान लाईन को अहमियत नहीं दी। चीन स्वीट्जरलैण्ड के आकार वाले अक्साई चिन पक अपनी दावेदारी जता रहा था। चीन,तिब्बत और जिनजांग के बीच अक्साई चीन से होकर एक सड़क का निर्माण करना चाहता था।

तिब्बत को हड़पने के बाद वह  यह भी कहने लगा था कि अरुणाचल प्रदेश में ब्रमहपुत्र का इलाका भी उसका है। इसी तरह शिपकिला र लिपूलेख के पूरे इलाके को विवादित बना दिया गया। चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ, के.एस. थिम्मेया ने रक्षा मंत्री कृष्णमेनन को आगाह किया था कि देर सबेर उत्तर पूर्व क्षेत्र में स्थितियां बिगड़ सकती हैं, लेकिन सेना कि बात को बहुत तवज्जो नही दी गयी।

शायद देश में नौकरशाही इस तरह हावी थी कि आर्डिनेंस फैक्टरी उस समय गोला बारुद की बजाय केतली,हिटर तैयार कर रही थी यह एक तरह की बेफ्रिक्री थी जबकि साठ के दशक की शुरुआत से ही चीन के ईरादे गड़बड़ दिखने लगेउनकी हुत तैयरी थी। उनके सैनिक रुस के ईधुनिक हथियार, बर्थ से बचाव के सामान, सेमी-ऑटोमोबाईल गन, मोटार्स राइफल, ग्रेनेड के साथ थे। लद्दाख में बड़ा अटैक था यहीं 13 कुमाऊं रेजिमेंट ने घमासान युद्ध किया था। वलोंग में आमने सामने की लड़ाई और लद्दाख में गोरखा राईफल का मोर्चा इस युद्ध की याद करने लायक दास्तान है इस युद्ध के साथ ही चीन के देश के एक बड़े भूभाग पर कब्जा कर लिया। 19 नवम्बर को जब चीनी सेना वापस हुई तो चीन के राषट्रपती माओ यह कहने की स्थिति में थे कि यह युद्ध भारत को सबक सिखाने के लिए किया गया, लेकिन आज हालात बदल गए हैं। अब कोई कुछ कह ले कुछ कर ले,1962 फिल नहीं दोहराया जा सकता।

रिटायर्ड मेजर जनरल शैलेन्द्र राज बहुगुणा 

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