Vishal Bhardwaj: फिल्म निर्माता विशाल भारद्वाज ने कहा कि अच्छी फिल्मों के लिए कामयाबी की राह आसान नहीं है, उन्हें काफी संघर्ष से गुजरना पड़ता है।
उन्होंने कहा, “ऐसा ही हाल ओटीटी से पहले के दौर में भी था और आज भी है, जब फिल्म निर्माता अपनी फिल्मों को स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म पर ले जाते हैं और उन्हें कहा जाता है कि फिल्म को पहले सिनेमाघरों में रिलीज किया जाना चाहिए।”
“ओ रोमियो” के निर्देशक ने आगे कहा कि इसका खामियाजा “दिल को छूने वाली और संवेदनशील फिल्मों” को भुगतना पड़ रहा है। बीस साल पहले, उनकी अपनी फिल्म “हैदर”, विक्रम आदित्य मोटवाने की “उड़ान” और अनुराग कश्यप की “गैंग्स ऑफ वासेपुर” जैसी फिल्मों के लिए पैसा जुटाना आसान था, जो सिनेमाघरों में रिलीज हुईं और दर्शकों द्वारा सराही गईं। अब ऐसा नहीं है।
भारद्वाज ने कहा, “अब आप उनके लिए पैसा नहीं जुटा पाएंगे। अब बांट दिया गया है जैसे कहा जाता है कि ये ओटीटी पर ले जाने वाला विषय है और ओटीटी वाले कहते हैं, ‘नहीं, हमें यह नहीं चाहिए, इसे पहले सिनेमाघरों में रिलीज करो, फिर हम इसे यहां लेंगे’। इस तरह से अच्छी फिल्में कामयाब नहीं हो पा रही हैं।”
उनकी नजर में इसे लेकर कुछ “कदम” उठाए जाने की जरूरत है और वो नहीं जानते कि ये कब होगा और क्या ये फिल्म के जरिए होगा या किसी नए माध्यम से। भारद्वाज ने आगे बताया कि मौजूदा हालात फिल्म निर्माताओं के लिए मुश्किल हैं क्योंकि उनके समकालीन और जिन निर्देशकों की वे तारीफ करते हैं, उनमें से ज्यादातर स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म के लिए कंटेंट बना रहे हैं।
भारद्वाज ने कहा, “हम फिल्म निर्माण के एक बहुत ही मुश्किल दौर में हैं। मुझे लगता है कि ये वैश्विक है.. सिनेमाघरों के लिए बनने वाली फिल्मों ने एक नया मोड़ ले लिया है।”
अपने समकालीनों- अनुराग, दिबाकर (बनर्जी), श्रीराम (राघवन), विक्रमादित्य और इम्तियाज (अली) का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि उनमें से ज्यादातर ओटीटी के लिए काम कर रहे हैं और अगर वे सिनेमाघरों के लिए फिल्में बनाते भी हैं, तो ये हमेशा सफल नहीं होतीं।