कैसें बदले अनदाता की तकदीर

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उत्तराखण्ड़ कृषि प्रधान राज्य होने के कारण यहां की 78 प्रतिशत से अधिक की आबादी खेती पर निर्भर रहती हैं। राज्य में कृषि बहुसंख्यक जनता की आजीविका का प्रमुख साधन हैं। यहां की कृषि भौगोलिक परिस्थितियो के अनुसार सीमित क्षेत्रो में की जाती हैं। राज्य का 85 प्रतिशत भाग पर्वतीय हैं। पर्वतीय क्षेत्रो में खेती वर्षा पर निर्भर है।पूरे वर्षभर मेहनत के बाद भी दो-चार महीने के लिए ही भरपूर अन्न यहां पैदा हो पाता है।यहां की भौगोलिक परिस्थिति कृषि कृर्षि के विकास में बाधक है।फिर भी अन्य आर्थिक क्षेत्रो में रोजगार और आजीविका की अपर्याप्तता के कारण स्थानीय लोगो की निर्भरता कृषि कार्यो में बढ़ती रही हैं।राज्य के अस्तित्व में आने के बाद भी पलायन का सिलसिला जारी रहा जिसका कृषि पर बुरा असर पडा है। हालांकि पिछले दो दशको से स्थानीय लोगो की निर्भरता कृषि कार्यो के साथ-साथ औद्योगिक कार्यो में भी घटती जा रही है।यहां की नवयुवकों का रूझान कृर्षि की ओर न होकर सरकारी व गैर सरकारी संस्थानों में रोजगार हासिल करने में है।
यहां पर्वतो की घाटियो और मैदानी क्षेत्रों में सिंचाई सुविधाओं के कारण अच्छी फसले पैदा होती हैं। जिसमें गेहूं और चावल प्रमुख हैं। इसके साथ ही यहां गन्ना और नकदी फसलें मैदानी भागों में की खेती होती है। पहाड़ी क्षेत्रो में मुख्यतः मोटा अनाज जिसे बारहनाजा के नाम से जाना जाता है अधिक पैदा होता हैं। जिनमें मंडुवा (कोदा), झंगोरा, तिलहन, चैलाई सोयाबीन,काली दाल,समेंत कई प्रकार की दालें आदि हैं। दलहनी फसलो में उडद ,गहत, सोयबीन (भट), आलू और बीन मुख्यतः हैं। राज्य के विभिन्न क्षेत्रो में उचित जलवायु की उपलब्धता के अनुसार कई उचाई वाले भागों में आलू की खेती की जाती हैं। मैदानी क्षेत्रों की तुलना में पर्वतीय क्षेत्रों में दलहनी फसलो का उत्पादन 80 प्रतिशत से भी कम हैं। राज्य के पर्वतीय क्षेत्रो में बागवानी, सब्जी उत्पादन, फलो की खेती, फलोरीकल्चर, जडी़-बूटी, मशरूम, रेशम उत्पादन, पशु-पालन ,मत्स्य पालन, मौन पालन, की प्रबल संभावनाएं हैं। यहां खेती के अलावा बे-मौसमी फल व सब्जियां भी बहुत तादाद में पैदा होती हैं। राज्य के विभिन्न क्षेत्रो में पूरे सालभर अनेक फल व सब्जियां उगाने के लिए अनुकूल जलवायु उपलब्ध हैं। यहां अनेक स्थानो में फलोत्पादन के शोध केन्द्र स्थापित किए गए हैं। जिनके माध्यम से फलोत्पादन में विकास को काफी बल मिला हैं।आजादी के बाद पर्वतीय जनपदो में फलोत्पादन में विशेष प्रगति हुई हैं। फलो के उत्पादन में कश्मीर व हिमाचल के बाद उत्तराखण्ड़ का ही स्थान हैं।

उत्तराखण्ड़ में बढ़ रही ड्राईफ्रूट्स खेती की संभावना
राज्य में सेब एक प्रमुख नकदी फसलो में से हैं। जिसमें अकेले 50 फीसदी सेब का उत्पादन उत्तरकाशी जिले में हैं। इसके अलावा चमोली,(जोशीमठ),नैनीताल व अल्मोड़ा में सेब की पैदावार अधिक हैं। वही अगर लीची की बात की जाय तो देहरादून में लीची का उत्पादन अधिक हैं।इसके अलावा आंडू, पुलम ,खुबानी, चेरी, कीवी, अखरोट, माल्टा, के सीजनल फल भी राज्य में अधिक होते हैंै। राज्य में अब ड्राई फ्रूट्स की खेती पर ज्यादा फोकस दिया जा रहा हैं। जिसमें मुख्यतः अखरोट और बादाम की खेती शामिल हैं। वही किसानो को ज्यादा से ज्यादा लाभ मिल सके, इसके लिए पौड़ी में स्थित बागवानी और वानिकी विश्वविद्यालय में कई प्रकार के नए फल और सब्जियोे की खेती करने का प्रशिक्षण किसानो को दिया जा रहा हैं। यहां पाॅलीहाउस के जरिए कई प्रकार के ड्राईफ्रूट्स की खेती की जा रही हैं। इसके साथ ही सेब की विभिन्न नई किस्मो को विकसित किया जा रहा हैं। राज्य में चाय के बागानो के लिए अनुकूल स्थानो को भी विकसित करने की नीति तैयार की हैं। जिसमें कई स्थानो पर चाय की नर्सरियां स्थापित की गई। यहां से अनुकूल स्थानों में चाय के पौधो का रोपण किया जाता हैं, जिससे हजारों लोगो को रोजगार मिल जाता हैं। वही फलोरीकल्चर के क्षेत्र पर नजर डाली जाए तो राज्य में 70 फीसदी पाॅलीहाॅउसो में फूलो की खेती की जाती हैं, जिससे अंदाजा लगाया जा सकता हैं कि फूलो की खेती की ओर किसानो का रूझान कितनी तेजी से बढ़ा हैं। राज्य में वैज्ञानिक तरीके से की जा रही फूलो की खेती से किसानो को अन्य फसलो के साथ आर्थिकी को मजबूत करने का बेहतर जरिया मिला हैं। यही वजह है कि नई पीढ़ी के लोग भी फलोरीकल्चर की ओर आकर्षित हो रहे हैं। राज्य में सब्जी व फूलो की खेती के अलावा औषधीय एंव सुगंधित वनस्पतियो और मसालो की खेती भी की जाती हैं।
कृषि के साथ-साथ पशुधन का योगदान
राज्य की आजीविका में कृषि के साथ-साथ पशुपालन का भी महत्वपूर्ण स्थान होता है। पशुपालन एंव कृषि एक दूसरे से जुडे हुए हैं, जो पशुपालको के लिए आजीविका के साधन भी हैं। राज्य में पशुधन का योगदान तेजी से बढ़ रहा हैं जिसका नतीजा यह हैं कि राज्य में डेरी क्षेत्र का तेजी से विकास हो रहा हैं। सरकार पशुपालन को स्वरोजगार परक एंव अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार बनाकर राज्य के सकल घरेलू उत्पाद में इसका योगदान बढ़ाने के लिए निरन्तर प्रयास कर रही हैं। पशुपालन की भी व्यापकता पर्वतीय क्षेत्रो में हैं और वहां के अनुकूल गायो और भैसो की प्रजातियो की किस्मे विकसित कर दुग्ध उत्पादन, बकरी और भेड़पालन को महत्वपूर्ण व्यवसाय के रूप में देखा जा रहा हैं।
उत्तराखण्ड़ में पर्वतीय क्षेत्र के किसान खेती से हो रहे दूर
पर्वतीय क्षेत्र के किसान खेती से दूर होेते जा रहे हैं। यहां के किसानों केे सामने मौसम की बेरूखी, जंगली- जानवरों का आंतक,बिखरी जोत का प्रबंधन समेत तमाम चुनौतियां खड़ी हैं।पर्वतीय क्षेत्रो में उपज की बिक्री न होने से यहां के किसान मंड़वा, झंगोरा, सोयाबीन और प्याज, लहसुन, आलू, मिर्च, अदरक, हल्दी, अरबी जैसी नकदी फसलो की खेती से भी हाथ खींच रहे हैं। फलो व सब्जियों की समुचित व्यवस्था न हो पाना और किसानो को अपने उत्पादनो की उचित कीमत न मिल पाना पलायन की एक प्रमुख समस्या हैं।

उत्तराखण्ड़ से पलायन रोकने की रणनीति

राज्य में अब जैविक कृषि का सहारा लिया जा रहा हैं। रासायनिक खादों और कीटनाशक दवाओं के बिना फसले उगाई जा रही हैं, जो मानव और पर्यावरण दोनो के लिये हितकर हैं। राज्य में विभिन्न क्षेत्रो पर भांग की खेती की बहुत संभावनाएं हैं। जहां औद्योगिक भांग की खेती से किसान कई गुना मुनाफा कमा सकते हैं, तो वही दूसरी ओर रोजगार मिलने से पलायन पर प्रभावी अंकुश लगाया जा सकता हैं। राज्य के पर्वतीय क्षेत्रों में जैव- विविधता अधिक पायी जाती हैं। यहां के किसान आम तौर पर मिश्रित फसल के साथ निर्वाह खेती करते हैं। वहीं पर्वतीय क्षेत्रो में खाद्यान्न उत्पादन की मात्रा काफी अस्थिर हैं, जिसके लिए किसानो को उच्च तकनीकी की जरूरत हैं, जिसे अपनाकर वे परंपरागत खेती की तुलना में फल, फूल, सब्जियंा, मशरूम, चाय, मछली पालन, मौन पालन, पशुपालन, जड़ी- बूटी एंव औषधीय पौधो के उत्पादन से ही कई गुना आमदनी बढा सकते हैं। कृषि तथा बागवानी के क्षेत्र में स्वरोजगार पैदा करके पर्वतीय क्षेत्रो से पलायन को कम किया जा सकता हैं।
राज्य में कृषि एक विकसित होता व्यवसाय है, जो राज्य की रोजगारोन्मुख आत्मनिर्भरता के लिए अतिआवश्यक है, परन्तु आने वाले वर्षो में जनसंख्या की निरन्तर वृद्धि तथा भूमिजोत के लगाातार कम होने के कारण पर्याप्त खाद्यान आपूर्ति सुनिश्चित करना एक चुनौती हैं। उन्नत कृषि तकनीकी, नवीनतम शोध का प्रसार तथा गुणवत्ता युक्त कृषि आगातों को किसानो के द्वार तक समय-समय पहुॅचाकर कृषि उत्पादन को बढाया जा सकता है। कृषि एंव बागवानी से जुड़े अन्य क्षेत्रो को आर्थिक विकास तथा आय का प्रमुख स्त्रोत बनाया जा सकता हैं।

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  1. Ek naye pariyojna se se agar hum sub Uttarakhand ki kirshi ka roop badal kar uksa naye tarike se pahl kare to sabhi ka vikas hona sambhav hai

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