पर ये तो बता तू काफिले में शामिल क्यों

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वेद विलास उनियाल

टंव्टी टंव्टी कहा जाने वाले यह वर्ष शुरू हो गया है।  यह एक रीत है कि आते वर्ष के लिए हम शुभकामना देते हुए मन मे कुछ में कुछ सपनें संजोते है। ऐसे पलों में गुजरे वर्ष के पहलू घटनाएं भी स्मृति में बनी रहती है। ऐसे समय हम कहीं न कहीं बीते वर्ष का अवलोकन भी करते हैं।  हालांकि कहा यही जाता है कि बीती ते बिसार दे आगे की सुध ले, लेकिन जिंदगी की दौड़ में पलट कर भी देखना पडता है।

इस लिहाज से देखें तो बीते साल के आखिरी दिनों ने मन को उदास किया। एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में आखिर ऐसे क्या बंधन दिखे कि कुछ लोग सड़कों पर उतर कर बसें जलाने लगे  पत्थरबाजी करने लगे  लोगों को डराने लगे।  और विद्रुप यह कि देश के कई जगहों में उत्तेजित भीड का हिस्सा बने लोगों में कइयों को यही पता नहीं कि वे उस उत्तेजित भीड़ का हिस्सा क्यों बने है। बन उन्हें कुछ इस तरह समझाया गया कि वह उस काफिले में चल पडे जो अपनी बातों के लिए सार्थक मंच नहीं हिसा का रास्ता अपना रहा था।  ऐसे ही कई लोग जब नागरिक संसोधन कानून सीएए का विरोध करते दिखे तो उनमें कइयों के लिए सीएए के मायने वही थे जो उन्हें समझाया गया। जिस सीएए में स्पष्ट उल्लेख है कि यह नागरिकता लेने का नहीं बल्कि देने का अधिकार है उसे लेकर यह चिंता अकारण ही थी कि सीएए से उनकी नागरिकता छीनी जा सकती है। उन्हें देश छोड़ने के लिए कहा जा सकता है। निश्चित तौर पर जब ऐसी अफवाहें फैलाई जाती है तो फिर कई लोग विचार करने की स्थिति में नहीं होते। या वह इतना संजीदा नहीं हो पाते कि मामले पर पूरी जानकारी ले।  आम लोगों की बात छोडिए ऐसे शिक्षित परिवार जहां मां बाप राज्यसभा के सांसद रह चुके हो वहां बेटा विदेश की पढाई करके लौटा हो और फिल्म जगत का जाना माना चेहरा हो अगर वही एनआरसी का विरोध करते करते यह न बता पाए कि वास्तव में सीएए का मतलब क्या है तो इस पूरे परिदृष्य को समझा जा सकता है।

भ्रम कई तरह से फैले । नागरिकता संसोधन कानून में( सीएए ) स्पष्ट रूप से कहा  गया है कि पाक बांग्लादेश अफगानिस्तान से धार्मिक प्रताडना के कारण भारत आए  हिंदू सिख बौद्ध इसाई पारसी जैन लोगों को भारत की नागरिकता दी जाएगी। इसमें भारत आने की एक निश्चित 2014 की तिथि तय की हुई है। यानी स्पष्ट है कि यह नागरिकता उन लोगों को मिलनी है जो धार्मिंक प्रताडना के चलते पहले ही देश में आकर रह रहे हैं। ये लोग न तो किसी खास जगह में बसाए जाएंगे न ये नए लोग हैं जो भारत में आकर यहां के युवाओं की नौकरी छीन लेंगे।  खास बात यह है कि पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और पाक प्रधानमंत्री लियाकत अली के बीच हुए समझौते मे कहा गया था कि दोनों देश अपने यहां अल्पसंख्यकों को पूरी सुरक्षा अधिकार देंगे। भारत मे इसका पालन होता रहा लेकिन खासकर पाकिस्तान में हिंदु सहित तमाम अल्पसंख्यक प्रताडित होते रहे उनके अधिकार छीने गए धर्मांतरण किया गया। उन पर बलात्कार हुए। कांग्रेस भी शुरू से ऐसे प्रताडित लोगों को जो भारत में आकर बसना चाहते हैं शरण देने के पक्ष में रही है। बहुत पीछे  पूर्व पीएम मनमोहन सिंह  समय प्रधानमंत्री मनमोहन सिह ने राज्यसभा में खुलकर ऐसे लोगों को नागरिकता देने की वकालत की थी। बेशक संसद के दोनों सदनों में यह बिल पास हो गया लेकिन सडकों पर और आम रैली जुलूसो में इस मामले को इस भटकाया गया। यह कहा गया कि खास नीति के तहत इस सूची में मुस्लिम शामिल नहीं किए गए। जबकि  सवाल यही था कि तीन मुस्लिम देशों में वहां प्रताडित अल्पसंख्यकों को लेकर यह नीति बनाई गई। जाहिर है कि इस नए कानून की सही समीक्षा करने के बजाय कुछ नेताओं ,बौद्धिक जमात का एक हिस्सा  और मुबई का फिल्मी जगत ने कहीं न कहीं इसे उलझाया। साफ है कि भारतीय नागरिकता संसोधन विधेयक नई सोच नहीं है बल्कि आजादी के बाद से ही यह विचार समय समय पर उठता रहा। यह अलग बात है कि अमल में अब लाया गया है। यहां भ्रम यह भी फैलाया गया कि राष्ट्रीयता नागरिक पंजीकरण के बाद जो लोग सूची से बाहर होंगे उन्हें मुस्लिमो को छोडकर बाकी सबको नागरिकता दे दी जाएगी।  ऐसे तमाम अफवाहों के चलते कुछ लोग साजिशन और कुछ भटकाव में कुछ भोलेपन में सडकों पर उतर आए।  हिंसा का तांडव हुआ।

भ्रांतियां  तो फैलाई ही गई  अराजकता के उस माहौल में  तथ्यो को अपने हिसाब से तोड़ मरोडा गया। जामिया विश्वविद्यालय की कुलपति नजमा अख्तर ने आरोप लगाया कि पुलिस ने बिना अनुमति से विश्वविद्यालय में प्रवेश किया। यह बयान किसी छोटे  नेता या एक्टिविस्ट का नहीं विश्वविद्यालय की कुलपति का बाकायदा प्रेम कांफ्रेस में दिया गया बयान था। मगर इस संजीदा पद पर बैठी कुलपति को यह आभास होना चाहिए था सीआरपीसी की  धारा 41,   47,  48 धाराओं में स्पष्ट उल्लेख है कि पुलिस हिसा आगजनी उपद्रव की स्थिति में किसी भी क्षेत्र में पूछेताछ और जानकारी के लिए प्रवेश कर सकती है।  बल्कि करना भी चाहिए।  विश्वविद्यालय किसी छात्र या कुलपति की निजि संपत्ति नहीं है। और वहां गई पुलिस भी एक सामाजिक दायित्व के तहत वहां गई। खासकर ऐसे समय में जब जब आग जल रही हो बसें फूंकी जा रही हो पत्थर बरसाए जा रहे हों तो पुलिस बल क्या कीर्तन करने के लिए नियुक्त किया गया है। उपद्रव दंगा आगजनी  दिल्ली लखनऊ अहमदाबाद अलीगढ  मेरठ कई जगहों पर होती दिखी। केवल जामिया विश्वविद्यालय के छात्र ही इसके केंद्र नहीं बने। पुलिस ने हर जगह छानबीन की अपने हिंसात्मक होते जाते माहौल को दबाने की भरसक कोशिश की।  ऐसे माहौल में भीड का नायक बनकर या सस्ती वाहवाही लूटने के लिए कोई बयान दे देना बहुत आसान है लेकिन स्थितियो से निपटने के लिए कितना जोखिम उठाना होता है इसकी कल्पना न बौद्धिक जमात करती है न मुंबईया फिल्म संसार। राजनेतांओं की तो अपनी राजनीति है लेकिन बौद्दिक और फिल्मी समाज में राजनीति के मचो पर अपने लिए अनुकूल माहौल तलाशता है। इसमें कुछ फिल्मी चेहरे अपने को ज्यादा मानवीय दिखाने की फिदरत में ऐसा कुछ कह जाते हैं जो व्यवस्था के लिए या माहौल को सजीदा बनाने के लिए आडे आ जाता है। कह नहीं सकते कि  बयानवीरों में कितनों ने एनपीआर  एनआरसी या सीएए के बारे में तह तक जाने की कोशिश की हो । यह भी भ्रम ही फैला कि केंद्र शीघ्र ही देश भर में एनआरसी लागी करने की तैयारी कर रहा है। निश्चित है कि इसका कोई पर्याप्त आधार बयान देने वालों के पास नहीं है। केवल असम में इसे सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर अपडेट किया गया है।  अब रैलियों का दौर है । भाजपा सीएए के पक्ष में जागरूकता फैलाने देश भर में रैली कर रही है तो कांग्रेस की रैलियां इस बात पर हो रही है कि भाजपा संविधान के खिलाफ जा रही है। खास बात यही है कि शिक्षा का स्तर बढने और संचार सोशियल मीडिया के प्रभावी होने पर भी आम लोगों तक कई बार तथ्य नहीं पहुंच पाते और अगर उन्हें कुछ पता भी चलता है तो कई बार सुनियोजित तरीके से तैयार किए बयान या रणनीतियां।

बीते साल ने जाते जाते ऐसे प्रसंगों पर जरूर मायूस किया हो पर उम्मीद यही की जानी चाहिए कि नया वर्ष नई उम्मीदों के साथ आए। हमारा देश लोकंतांत्रइक मूल्यों का पालन कर सके। सरकार भी सवेदनशील हो और विपक्ष भी सत्ता पाने के उतावलेपन में संजीदगी न खोए। लोकतंत्र केवल सत्ता से ही नहीं विपक्ष से भी बनता है।

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