ये तीन साल

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वेद विलास उनियाल

जो उत्तराखंड अपने उन्नीस वर्ष पूरे कर चुका हो , उसके लिए तीन वर्षों का एक अलग खाका उतार पाना थोडा मुश्किल सा होता है। तीन वर्ष की सफलता या कमी में बाकी समय अवधि सत्ता शासन  किस तरह चली है उसका भी समावेश होता है। लेकिन तीन वर्ष का समय इतने आकंलन के लिए काफी होता है कि कोई सरकार किस तरह चली है।

राज्य विधानसभा चुनाव के बाद जब भाजपा को प्रचंड बहुमत मिला तो कमान त्रिवेंद के हाथ में सौंपी गई। केंद्र में मोदी सरकार का होना और राज्य में पहली बार किसी दल की सहायता लिए बिना सरकार बनने की स्थिति में त्रिवेंद्र सिंह रावत के लिए अनुकूल स्थिति थी। इसलिए आतंरिक रूप से दल के अंदर सत्ता का संघर्ष देखने को नहीं मिला। छिटपुट नाराजगी कहीं थी भी तो कब दिखी और कब छिप गई पता भी नही चला। ऐसे समय में जब कुछ नाम उभर भी रहे थे लेकिन – संगठन का कौशल आरएसएस पृष्टभूमि ,झारखंड में प्रभारी के तौर पर बेहतर भूमिका , सरल स्वभाव वाली पृष्ठभूमि में त्रिवेंद्र के लिए अवसर बने। यह स्थिति ऐसी थी कि पार्टी के पास शानदार बहुमत  था और  हाइकमान का बरदहस्त था। बुरी तरह पराजित होकर कांग्रेस की अपनी आंतरिक कमजोरीसे बेदम पडी थी। खासकर राज्य में  सियासी दलों की ब्लेकमेलिंग का डर भी नहीं था।  ऐसे समय में उनके सामने जो चुनौतियां थी उसमें भाजपा को साथ लेकर चलने के साथ कांग्रेस से आए बडे नेताओं को भी उन्हें साधना था। साथ ही केंद्र की नीतियों योजनाओं को साकार करना क्षमता और प्रंबधन की कसौटी थी  जिस पर खरा उतरना था।

उत्तराखंड के बनने के साथ ही यही अपेक्षाएं लोगों के मन में थी कि राज्य को एक आदर्श राज्य के रूप में स्थापित किया जाएगा।  राज्य में बुनियादी संसाधनों की कमी देखते हुए इसकी प्रगति के लिए पर्यटन तीर्थाटन बागवानी को विकास का महत्वपूर्ण पहलू  माना गया। उत्तराखंड के बारे में अक्सर यही कहा जाता रहा कि अगर इस राज्य में नियोजित ढंग से विकास होगा तो यह राज्य देश के लिए आदर्श राज्य के रूप में आगे आएगा।  जन्म से ही राजनीतिक अस्थिरता देख रहे राज्य के एक ऐसे नेता ने पद संभाला जो काफी दृढ माना गया। जो निर्णय लेने में सक्षम है। कहीं न कहीं आभास दिलाया कि वह आसपास घेराबंदी को पसंद नहीं करते। त्रिवेंद्र ने अपनी छवि के अनुरूप जब जीरो टालरेंस की बात कही तो संकेत भी मिला कि राज्य अपने कुछ प्रचलित लीक को तोड़ता हुआ दिखेगा। जल्दी ही यह नजर भी आया सत्ता के केंद्र के आसपास घिरा हुआ जमावडा जल्दी समझ गया कि सत्ता के मिजाज में बहुत कुछ बदलने वाला है।

भाजपा को 2014 की तरह इस बार भी लोकसभा की पांचों सीट दिलाकर त्रिवेंद्र सिंह ने अपनी क्षमता का अहसास कराया। भले ही मोदी मैजिक का अपना प्रभाव रहा हो लेकिन राज्य नेतृत्व को इसका क्रेडिट मिलता ही है। भाजपा का विजयी रथ पंचायती चुनाव और नगर निगम में भी उपलब्धियों के रूप में देखा गया। पिथौरागढ का उपचुनाव भी भाजपा के पक्ष में गया।

मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने कमान संभालते ही कई फैसले लिए. कई ऐसे फैसले लिए जिन्होने प्रदेश की आर्थिक स्थिती में अपना अलग योगदान दिया तो कई ऐसे फैसले भी लिए जो की प्रदेश के लिए बेहद जरुरी थे।  आयुष्मान भारत योजना की तर्ज पर प्रदेश के सभी 23 लाख परिवारों को सालाना 5 लाख रुपए तक का कैशलेस इलाज उपलब्ध कराने वाला यत्तराखंड देश का पहला राज्य बन है। जल्द ही दुर्गम स्थानों पर त्वरित उपचार पहुंचाने के लिए 26 जनवरी से एयर एम्बुलेंस सेवा शुरू हो रही है। पहाड़ो की लाइफ लाइन कहे जानी वाली इमरजेंसी 108 एंबुलेंस की संख्या बढ़ाई जा रही है। जनवरी तक 139 नई 108एंबुलेंस शामिल कर ली जाएंगी। पहली बार उत्तराखंड में इन्वेस्टर्स समिट का सफल आयोजन हुआ। इससे राज्य में 1 लाख 24 हजार करोड़ रुपये के निवेश के लिए एमओयू  साइन किये गए। पहली बार विभिन्न अस्पतालों में 1137 से ज्यादा नए डॉक्टरों की तैनाती की गई, पहले प्रदेश में कुल 1081 डॉक्टर थे, अब इनकी संख्या बढ़कर 2218 हो गई। प्रदेश में टेलिमेडिसिन और टेलीरेडियोलॉजी जैसी आधुनिक तकनीकें लाई गई।

.राज्य सरकार की एक खास उपलब्धि के तौर ऐसी योजनाओं को फिर से धरातल पर लाना है जो वर्षो से अघर में अटकी हुई थीं।  बयालीस साल से अधर में लटकी लखवाड़ बहुद्देश्यीय परियोजना पर 6 राज्यों के बीच सहमति बनी, 300 मेगावाट की परियोजना से उत्तराखंड को बिजली और सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध होगा जबकि यूपी, दिल्ली, हरियाणा, हिमाचल और राजस्थान को पीने का पानी मिल सकेगा। इसी तरह जमरानी बांध के लिए मंजूरी मिलना आशा के नए द्वार खोलता है। पेयजल और सिंचाई के लिहाज से जमरानी बांध परियोजना कुमाऊं और तराई क्षेत्र के लिए वरदान की तरह है।

पर्यटन हमारी अर्थव्यवस्था का आधार है, साहसिक पर्यटन से जुड़ी गतिविधियों को उद्योग का दर्जा दिया गया। अब साहसिक पर्यटन को एमएसएमई उद्यमियों जैसी सुविधाएं मिलेंगी। ग्रामीण पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए होमस्टे को मजबूत किया जा रहा है। फिलहाल पांच हजार होमस्टे  की योजना राज्य में समृद्धि लाने में सहायक है । होम स्टे योजना परवान चढेगी और राज्य में खुशहाली के साथ सौंदर्य़ बढेगा । खिर्सू में बना बासा भविष्य के उत्तराखंड में होम स्टे योजनाओं की एक झलक है। पहली बार धार्मिक पर्यटन के अतिरिक्त पर्यटन को बढ़ावा देने की पहल की गई, 13 जिलों में 13 नए टूरिस्ट डेस्टिनेशन विकसित किए जा रहे हैं। पर्यटन को बढ़ावा देने की कोशिशों के लिए उत्तराखंड को टूरिज्म क्षेत्र के प्रतिष्ठित ग्लोब स्टार अवार्ड से नवाजा गया है। उत्तराखंड को फिल्म शूटिंग का बेस्ट डेस्टिनेशन बनाने की कवायद हुई, पहली बार कोई मुख्यमंत्री फिल्मकारों के बीच सीधी बातचीत के लिए पहुंचा, पिछले एक साल में 10 बड़ी फिल्मों की शूटिंग उत्तराखंड में हुई। इसके लिए उत्तराखंड को बेस्ट फिल्म फ्रेंडली स्टेट का नेशनल अवार्ड भी मिल चुका है।

राज्य सरकार का एक बडा फैसलाचार धाम और इससे जुडे 51 मंदिरों के लिए देवस्थापन प्रबंधन बोर्ड की स्थापना करना है। उत्तराखंड के तीर्थ धामों में जिस तरह तीर्थाटन तेजी से बढा है उसमें मंदिरों के रखरखाव यात्रियों की सुविधा के लिए इस फैसले को बडा कदम माना जा रहा है।  सरकार मंदिर समितियों को इस मामले में विश्वास में लेने के लिए प्रयासरत है। देश के कई प्रसिद्ध मंदिरों को श्राइन बोर्ड के तहत लाने के अच्छे परिणाम दिखे हैं। देश का पहला ड्रोन एप्लीकेशन सेंटर उत्तराखंड में शुरू किया गया है, ड्रोन एप्लीकेशन और साइबर सिक्योरिटी के क्षेत्र में उत्तराखंड के युवाओं के लिए यह एक क्रांतिकारी कदम साबित होगा।. पहली बार कनेक्टिविटी रहित गांवों को डिजीटल बनाने की पहल की गई। रेडियो फ्रीक्वेंसी से दूरस्थ गावों में इंटरनेट पहुंचाया गया, इसकी बदौलत आज घेस, हिमनी, पीपलकोटी जैसे सीमांत गांवों को स्मार्ट विलेज बनाया गया।

18 साल के इतिहास में पहली बार किसी सरकार ने भ्रष्टाचार के खिलाफ व्यापक युद्ध छेड़ा है, जिसमें बड़े अफसरों तक को सस्पेंड किया गया। गरीब का राशन चुराने वालों पर कार्रवाई हुई। घोटालेबाजों में खौफ का माहौल बना है। आर्थिक अनुशासन व पारदर्शी नीतियों से राज्य का खजाना बढ़ रहा है। पारदर्शी खनन नीति के चलते खनन के राजस्व में वर्ष2018-19में अगस्त माह तक195 करोड़ का राजस्व जुटाया गया है जो पिछली अवधि की तुलना में 82 फीसदी ज्यादा है। जीरो टालरेंस की नीति के साथ सरकार ने इस बात का ध्यान रखा है कि राज्य में प्रशासन व्यवस्था को   नैतिक मापदंडों का आभास रहे।

राज्य के इतिहास में पहली बार किसी मुख्यमंत्री ने नदियों को पुनर्जीवित करने का बीड़ा उठाया। रिस्पना व कोसी नदियों को पुनर्जीवित करने के लिए व्यापक वृक्षारोपण अभियान चलाया। खुद मुख्यमंत्री ने बढ़ चढ़कर इस अभियान को सफल बनाने में योगदान दिया।

पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश के साथ 18 साल से लटके परिसंपत्तियों के मामले को सुलझाने की सफल कोशिश हुई है। होटल अलकनंदा पर अब उत्तराखंड का अधिकार हुआ है। सौभाग्य योजना व राज्य सरकार के प्रयासों से प्रदेश का गाँव गाँव बिजली से रोशन हो रहा है। आजादी के 70 साल बाद देश का सीमान्त गाँव घेस अब जाकर बिजली से रोशन हुआ है। टिहरी झील को पर्यटन क लिहास से भी विकसित किया जा रहा है।

जहां तक डबल इंजन चलने की बात है । पीएम मोदी के ड्रीम प्रोजेक्ट में केदारपुरी का पुननिर्माण का काम भी अब आखरी चरण में है। तीर्थाटन, पर्यटन और सामरिक दृष्टि से आल वैदर रोड इस योजना को लेकर काफी उत्सुक्ता है। आल वैदर रोड बारह महीनों के लिए तीर्थाटन और पर्यटन को लेकर एक बहुत बडा कदम है। चार धामों को जोड़ने वाली ऑल वेदर रोड का कार्य प्रगति पर है। इसके बीच आने वाली कई जटिलताएं सुलझा ली गई है।ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेललाइन पर जिस गति से काम चल रहा है उससे यही अपेक्षा है कि लगभग पांच वर्षों में रेल पहाडों में चलने लगेगी। इधर दिल्ली से दून तेजस चलने की घोषणा हुई है तो दिल्ली से दून के लिए सहारनपुर बागपत होते हुए इकोनोमिक कोरिडोर बनने से सपने जागे हैं।सियासत के लिहाज से भाजपा ने प्रदेश में  सरकार और संगठन के तालमेल को बेहतर बनाकर रखा। भाजपा ने अपने कार्यक्रमों को संगठन के माध्यम से भी वखूबी आम जन तक पहुंचाया । अमूमन पार्टी के अंदर मतभएद इस तरह नहीं उभरे कि बडी चर्चा का विषय बने और विपक्ष उसमें कहीं दरार तलाश सकें।

बेशक राज्य सरकार काम करती हुई दिखी है। लेकिन कई पहलुओं पर अभी चुनौती बनी हुई है। वन्य क्षेत्र में अभी एक सिस्टम नहीं बन पाया है। वन क्षेत्रों में आग लगना, वन्य मानव संघर्ष  और वनों में जंगली जानवरों का मारे जाने की खबर मिलती रही है। राज्य बनते समय जिस तरह के आकडे मिलते थे वह स्थिति आज भी थमी नहीं है। सरकार नई आबकारी नीति लाई है। लेकिन जहरीली शराब से हुई मौतों ने लोगों को दहलाया है। पलायन अभी भी रुक नहीं रहा है। वहीं स्वास्थ्य के क्षेत्र में बहुत कुछ किया जाना है। खासकर राज्य के दूरदराज ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य के क्षेत्र में काफी बडे कदम उठाने होंगे। राज्य की कृषि बागवानी को एक स्पष्ट दिशा चाहिए।  आगे राज्य सरकार के समक्ष अगले वर्ष होने वाले हरिद्वार कुंभ को व्यवस्थित और भव्य रूप देना एक चुनौती है। गंगा की शुद्धता और निर्मलता के लिए नमानी गंगे के शेष नौ प्रोजेक्ट को साकार करना होगा। सबसे जरूरी है कि राज्य सरकार की योजना और कार्य आम जनता तक पहुंच सके और जनता उन योजनाओं का लाभ ले सके। तीन साल होते हुए सरकार इस दिशा में सक्रिय दिख भी रही है।

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