आओ मजदूर मजदूर खेलें

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मजदूर शब्द एक बार फिर कविता नारों में दिखाई देने है। मजदूर की नियति यही रही कि उनके होने का सबसे ज्यादा सियासी लाभ उठाया गया। कोरोना के इन हालातों में मजदूर एक बार फिर सबके लिए आवाज उठाने का एक पात्र बना है। हर किसी की जुंबा पर मजदूर है । सियासत , मीडिया बौद्धिक समाज हर कोई मजदूर पर अपने दांव चलते देखा जा रहा है। वास्तव में यह मजदूर वर्ग की चिंता नहीं बल्कि इसके पीछे सियासी रोटी सेंकने और इसमें सहयोग देने की प्रवृत्ति ज्यादा नजर आती है। जहां भी देखिए मजदूरों के हितेषी अलग अलग भावभंगिमाओं में नजर आ रहे हैं। नजारा इस तरह दिख रहा है कि मानों यही मजदूरो के हितेषी हों और पूरा जीवन इन्होंने मजदूरों के हितों उनकी तखलीफ को दूर करने में समर्पित कर दिया हो। लेकिन असलियत में ऐसे दृश्य ऐसे नारे और ऐसी जज्बाती  टिप्पणियां केवल हवाओं में गूंजती है। मजदूर की दशा को सुधारने उसके जीवन को व्यवस्थित रखने का कोई काम धरातल पर होता तो यही मजदूर दर दर क्यों भटकता ।

साम्यवादी आंदोलन ने मजदूर किसान की आवाज को अपना आधार बनाया और देखते ही देखते पूरी दुनिया में यह नारा गूंजने लगा। दिवारों में मजदूर किसानों के लिए आकर्षक नारे लिखे जाने लगे।  उस दौर के बाद यही लगने लगा था कि नारे आकाश को छूकर धरातल पर भी उतरेंगे और इनके जीवन में एक नया सवेरा आएगा। दौर ऐसा चला कि कविता कहानी साहित्य की विधा में मजदूर  ही केंद्र में रहा। सोवियत संघ से होती यह आवाज चेकोस्वालिया पौलेंड रोमानिया पूर्वी जर्मन चीन से होती हुई दुनिया में इस तरह फैलती गई कि भारत का एक बडा वर्ग भी इसके आकर्षण में आया ।

आजाद हुए भारत में मजदूर शब्द सियासत को खूब लुभाया। और तब से आज तक मजदूर का जीवन स्तर भले वहीं का वहीं हों लेकिन उसके नाम पर जम कर सियासत हुई। आज तक देश कोरोना की विश्वव्यापी महामारी झेल रहा हो तब भी मजदूरों के नाम पर खुल्ला खेल चल रहा है। ऐसे समय जब वास्तव में मजदूरों की तकलीफ दूर करनी थी  ऐसे समय जब जिला मंडल स्तर पर पार्टियों के नेता मजदूरों के लिए आगे बढकर काम कर सकते थे। उनकी तकलीफ को दूर करने का प्रयास करते । बेशक कुछ जगहों पर काम हुआ भी होगा लेकिन ज्यादातर नाटकियता ही देखने को मिली। अब तक मजदूरों की किसी भी तरह की सुध न लेने वाला और अपने ही खांचों में रहने वाला मीडिया अचानक मजदूरों की खबरों को इस तरह परोसने लगा जिससे नकारात्मकता फैलती गई। बेशक उन मजदूरों की दिक्कतों को बताना मीडिया का फर्ज है लेकिन खबरों को इस ढंग से परोसा गया कि जैसे राजनीतिक कारणों से मजदूरों को सडक पर आने के लिए विवश किया गया हो। ध्यान रहना चाहिए था कि किसी राज्य से मजदूर वहा के किसी आंदोलन के चलते पलायन नहीं कर रहे थे बल्कि अचानक खडी वैश्विक महामारी ने ये हालात बनाए कि हर कोई अपने स्तर पर संकट झेल रहा है।

केद्र और राज्य सरकारों ने अपने स्तर पर जो भी प्रबंध किए लेकिन मजदूरों का एकाएक घर छोड़ने के बाद स्थिति को ताबड़तोड़ नियंत्रण नहीं किया जा सकता था। गौर करना होगा कि इस महामारी के समय कुछ अफवाहें भी समय समय पर उडाई गई। इनसे हालातों को संभालने में दिक्कत आई है। यह भी देखा जाना चाहिए कि कोरोना संक्रमण जैसी बीमारी के बचाव के लिए जूझने का केंद्र या राज्य सरकारों का यह अपने तरह की पहली चुनौती थी। इन स्थितियों में आरोप प्रत्यारोप का चलन किसी समाधान की ओर नहीं पहुंचता, बल्कि स्थिति को और जटिल ही बनाता है। होना यही चाहिए था कि वैश्विक महामारी से लड़ने के लिए कुछ समय राजनीतिक आग्रह हित सब छोड़ दिए जाते । लेकिन भारतीय राजनीति में यह संभव नहीं है। इसलिए जहां जिसे अवसर मिला उसने इस पूरे खेल को खेलने की कोशिश की। मजदूरो की मदद के नाम पर  एक दूसरे को घेरने की कोशिश , एक दूसरे को नीचा दिखाने की कोशिश सब तौर तरीके चलते रहे।  कुछ नेता विडियों बनाकर यह जताते दिखे कि शासन प्रशासन की लापरवाही और अविवेक से मजदूरों के ये हालात हुए कि वे सड़कों पर उतर आए हैं। यह कहीं न कहीं परिस्थितियों पर धूल झोंककर लोगों को गुमराह करने जैसा था। यहां उन परिस्थितियों को अनदेखा किया गया कि जिन मजदूरों के साथ वीडियों खिचवाया जा रहा है वे किन प्रदेशों से किन हालातों में चलकर पहुंचे हैं। अगर इसका भी खुलासा होता तो फिर सवाल जवाबों में कोई एक दूसरे से नहीं उलझता। क्योंकि यह सारी समस्या किसी एक दल एक धारा से जुडी न होकर पूरे देश भर की है। कोई भी सरकार इन परिस्थितियों में समान स्थितियों से जूझती नजर आती। लेकिन चंद पलों के लिए मजदूरों क बीच जाकर कुछ क्लिपिंग बनाकर उसे प्रायोजित ढंग से दिखाने का आशय यही है कि वे इससे मजदूरों का हित नहीं बल्कि एक अलग तरह की चर्चा पाना चाहते थे और कहीं न कहीं सियासी खेल में दूसरे पाले को पछाडना चाहते है।  राजनीति में उठापटक चलती रहती है लेकिन यह समय सियासत का नहीं है। बलकि संजीदा होकर मिलजुल कर काम करने का है।  हद तो तब है कि जब एक रेल स्टेशन में मजदूरों को ऐसे कार्ड बांटे देखे गए जिसमें एक  राजनीतिक पार्टी मजदूरों को भेजने का श्रेय लेने की कोशिश करती देखी गई। बिहार की एक राजनीतिक पार्टी ने तो मजदूरों के बिहार पहुंचने पर उन्हें राशन पानी देने से पहले पार्टी का फार्म भरवाया।

वास्तव मे मजदूरों ने बहुत दुख उठाया। उनके लिए हर किसी को हमदर्दी है। किसी भी तरह यह अपेक्षा की जाती है कि जब वे अपने घरों में लौटें तो उनके लिए काम धंधे की व्यवस्था हो सके । लेकिन यह भी देखा जाना चाहिए कि समस्या केवल मजदूर वर्ग के सामने ही नहीं , रेहडी वाले  छोटे छोटे काम धंधे वाले कारखानों में छोटे वेतन में काम करने वाले ड्राइवर कंडक्टर होटलों में काम करने वाले रिक्शा चलाने वाले ऐसे तमाम लोग समान परिस्थितियों में जूझ रहे हैं। लेकिन इनके लिए कोई आवाज नहीं उठती। जब इनकी बात होती है तो सामूहिकता में आकर ठहर जाती है। जबकि देखा गया है कि ऐसे लोग दस हजार रुपए महीने के वेतन पर बडे शहरों में कठिन जीवन यापन करते रहे हैं। ऐसे लोग भी सड़कों पर आए और उनके सामने फिर से रोजगार पाने का संकट है। छोटे मोटे काम तो शुरू हो जाएंगे लेकिन इन लोगों के लिए स्थानीय स्तर पर रोजगार उपलब्ध होने में कुछ समय दिक्कत आएगी । वह भी तब जब स्थानीय स्तर पर कारोबार उद्यम कृषि बागवानी कुटिर उद्योग श्रम शिल्प आदि के लिए प्रयास किए जाएंगे। लेकिन यह सब एक क्षण में नहीं होगा इसके लिए कुछ समय लगेगा। उनके जीवन को पटरी पर लाने में कुछ समय लगेगा। लेकिन इन लोगों के लिए कोई नारा आकर्षक नहीं होता वे हाशिए पर है। मजदूरों की तरह इनका जीवन भी कठिन है.

देश में आज उस युवा की चिंता भी होनी चाहिए जो डरा सिमटा पड़ा है न वो मज़दूरी कर सकता है न लाइन में लगकर खाना खा सकता है. उसे अपना वजूद भी बचाना है परिवार भी पालना है. बच्चो के सामने अपने को उनका हीरो भी दिखाना है. ऐसे ही डर का माहौल हम बनाते रहे तो उसका क्या वो तो टूट ही जायेगा. शर्म करनी चाहिए हमें , आखिर क्यों हम इस तरह का नकारात्मक माहौल बना रहे.अरे राजनीति करने के लिए बहुत समय है जब जीवन ही नहीं तो राजनीति कैसी ? देश की चिंता करो और आने वाले भविष्य की !

देश में जानबूझ कर एक तरह की नकारात्मकता फैलाई गई है। सिसायत या दूसरे हितों के लिए इस प्रवृत्ति से बचना चाहिए था। लेकिन इस पूरे प्रकरण पर जमकर सियासत की गई। व्यवस्थाओं का माखौल उडाते उडाते सियासत यह भी भूल गई कि उन व्यवस्थाओं को इस हाल में बनाए रखने के लिए वे स्वंय में भी जिम्मेदार है।

 

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