Delhi: स्कूलों में छात्राओं को मुफ्त सैनिटरी पैड, अलग शौचालय उपलब्ध कराएं, सुप्रीम कोर्ट का सभी राज्यों को निर्देश

Delhi: मासिक धर्म स्वास्थ्य को संविधान के तहत जीवन के अधिकार का हिस्सा बताते हुए उच्चतम न्यायालय ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया कि वे छात्राओं को बिना किसी शुल्क के जैविक रूप से नॉन डिग्रेडेबल सैनिटरी पैड उपलब्ध कराएं और लड़के-लड़कियों के लिए अलग-अलग शौचालय सुनिश्चित करें।

लैंगिक न्याय और शैक्षिक समानता सुनिश्चित करने के लिए एक ऐतिहासिक फैसले में, न्यायमूर्ति जे. बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को कई निर्देश जारी करते हुए कहा कि ये सुनिश्चित किया जाए कि ये सुविधाएं सभी स्कूलों में उपलब्ध हों, चाहे वे सरकारी हों, सहायता प्राप्त हों या निजी स्कूल हों।

न्यायमूर्ति पारदीवाला द्वारा लिखे गए 126 पन्नों के फैसले में अनुपालन न करने पर गंभीर परिणामों की चेतावनी दी गई, जिसमें निजी स्कूलों की मान्यता रद्द करना और सार्वजनिक संस्थानों में विफलताओं के लिए राज्य सरकारों को सीधे तौर पर जवाबदेह ठहराना शामिल है।

पीठ ने कहा, ‘‘संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन के अधिकार में मासिक धर्म स्वास्थ्य का अधिकार भी शामिल है, सुरक्षित, प्रभावी और किफायती मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन उपायों तक पहुंच एक बालिका को यौन और प्रजनन स्वास्थ्य के उच्चतम स्तर को प्राप्त करने में मदद करती है। स्वस्थ प्रजनन जीवन के अधिकार में यौन स्वास्थ्य से संबंधित शिक्षा और जानकारी प्राप्त करने का अधिकार भी शामिल है।’’

इसने कहा, ‘‘मासिक धर्म के दौरान स्राव को सोखने वाले नैपकिन की उपलब्धता के संबंध में, हम निर्देश देते हैं कि सभी राज्य और केंद्र शासित प्रदेश ये सुनिश्चित करें कि शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में सरकार द्वारा संचालित या निजी तौर पर प्रबंधित प्रत्येक स्कूल में मानकों के अनुरूप निर्मित ऑक्सो-जैविक रूप से अपघटनीय सैनिटरी नैपकिन निशुल्क उपलब्ध कराए जाएं।’’

आदेश में कहा गया कि सैनिटरी नैपकिन छात्राओं के लिए सुलभ कराए जाएंगे, खासतौर से शौचालय परिसर के भीतर, वेंडिंग मशीनों के माध्यम से, या जहां ऐसी व्यवस्था तुरंत उपलब्ध न हो, वहां स्कूलों के भीतर एक निर्दिष्ट स्थान पर या एक निर्दिष्ट प्राधिकार के पास। शौचालयों के मुद्दे पर, इसने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि ‘‘प्रत्येक विद्यालय में कार्यात्मक, लिंग-विभाजित शौचालय हों, जिनमें उपयोग योग्य जल संपर्क की सुविधा हो’’।

आदेश में कहा गया कि स्कूलों में मौजूदा और नवनिर्मित सभी शौचालयों को इस तरह से डिजाइन, निर्मित और रखरखाव किया जाए कि गोपनीयता और पहुंच सुनिश्चित हो सके, जिसमें दिव्यांग बच्चों की जरूरतों को पूरा करना भी शामिल है। इसने कहा कि सभी स्कूल शौचालयों में साबुन और पानी की उपलब्धता के साथ हाथ धोने की सुविधाएं होनी चाहिए।

न्यायमूर्ति पारदीवाला ने कहा कि शिक्षा के अधिकार को एक गुणक अधिकार कहा गया है, क्योंकि ये अन्य मानवाधिकारों के प्रयोग को सक्षम बनाता है। फैसले में कहा गया, ‘‘शिक्षा का अधिकार (आरटीई) जीवन और मानवीय गरिमा के अधिकार के व्यापक ढांचे का हिस्सा है, जिसे शिक्षा तक पहुंच के बिना साकार नहीं किया जा सकता।’’

न्यायालय ने कहा, ‘‘मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन उपायों की अनुपलब्धता एक लड़की की गरिमा को कम करती है, क्योंकि गरिमा उन परिस्थितियों में व्यक्त होती है जो व्यक्तियों को अपमान, बहिष्कार या अनावश्यक पीड़ा के बिना बाहर निकलने में सक्षम बनाती हैं।’’

आदेश में कहा, ‘‘निजता गरिमा से अटूट रूप से जुड़ी हुई है। परिणामस्वरूप, निजता के अधिकार के तहत सरकार का यह कर्तव्य है कि वह न केवल निजता का उल्लंघन करने से परहेज करे, बल्कि व्यक्ति की निजता की रक्षा के लिए आवश्यक उपाय करने का दायित्व भी उस पर निहित है।’’

आदेश में कहा गया कि समानता का अधिकार समान शर्तों पर भाग लेने के अधिकार के माध्यम से व्यक्त किया जाता है; साथ ही, अवसर की समानता यह आवश्यक बनाती है कि हर किसी को लाभ प्राप्त करने के लिए आवश्यक कौशल हासिल करने का उचित मौका मिले। इसमें अनुच्छेद 21ए के तहत शिक्षा के मौलिक अधिकार और आरटीई अधिनियम पर भी चर्चा की गई, जिसमें अनिवार्य और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा शामिल है।

फैसले में कहा गया कि सभी स्कूलों को आरटीई की धारा 19 में निर्धारित मानदंडों और मानकों के अनुसार कार्य करना होगा। शीर्ष अदालत ने कहा, ‘‘यदि कोई विद्यालय, जो सरकार या स्थानीय प्राधिकरण द्वारा स्थापित, स्वामित्व या नियंत्रित नहीं है, आरटीई अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन करता पाया जाता है, तो उसकी मान्यता रद्द कर दी जाएगी और इसके परिणामस्वरूप कार्रवाई की जाएगी।’’

पीठ ने कहा कि सभी राज्य और केंद्र शासित प्रदेश यह सुनिश्चित करेंगे कि प्रत्येक विद्यालय में मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन कॉर्नर स्थापित किए जाएं। इसने मासिक धर्म स्वास्थ्य के बारे में जागरूकता और प्रशिक्षण पर भी निर्देश जारी किए।

इसने कहा कि इस मुद्दे पर पुरुष शिक्षकों और छात्रों को जागरूक करने की ज़रूरत भी है। अदालत ने चार सवाल तैयार किए, जिनमें यह भी शामिल है कि क्या पैड और शौचालयों की अनुपलब्धता ऐसी प्रणालीगत बाधाएं पैदा करती है, जो किशोरियों को लड़कों के साथ समान शर्तों पर शिक्षा में भाग लेने से रोकती है, जो अनुच्छेद 14 (समानता) का उल्लंघन है। इसमें इस बात पर भी विचार किया गया कि क्या मासिक धर्म संबंधी स्वास्थ्य, संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रजनन स्वास्थ्य और गरिमापूर्ण जीवन जीने के लिए आवश्यक है। शीर्ष अदालत ने 10 दिसंबर, 2024 को जया ठाकुर द्वारा दायर एक जनहित याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।

इसमें स्कूल जाने वाली लड़कियों के लिए मासिक धर्म स्वच्छता संबंधी केंद्र सरकार की नीति को स्कूल जाने वाली लड़कियों के लिए अखिल भारतीय स्तर पर लागू करने का अनुरोध किया गया था।

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