SHANKER SNEHILकी एक लघु कथा

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शुभ प्रभात, मित्रों
एक लघु कथा
आधुनिकता के भैंट चढ़ते आत्मीय रिस्ते,,,

बात उन दिनों की है ,जब मैं आवाशीय गुरुकुल महाविद्यालय विद्यालय बैधयानाथ देवघर का छात्र था।मेरी उम्र यही कोई 10-12 वर्ष की रही होगी।गर्मियाँ कीछुटियाँ मई माह के प्रथम या दिव्यतीय सप्ताह मे होतो थी। सभी सहपाठी कुछ मिश्रित भाव लिए अपने अभिभावक के साथ अपने अपने घर को एक दूसरे से गले मिलते हुए विदा हो जाते थे। मैं देवघर अपने पालक माता पिता के घर आता कुछ दिन के बाद अपने पिता के साथ अपने गांव हरपुर हंडेर पटना के लिए प्रस्थान करता,उन दिनों हावड़ा दिल्ली लाइन पे तूफान एक्सप्रेस रेलगाड़ी चला करती थी ,आज भी चलती है उसे पकड़कर पटना आता मझली नानी की यहाँ रहकर लोन आज का गांघी मैदान मे सुबह सैरकर पूरा पटना घूमता,एक दो दिन के बाद अपने गांव पहुच ता अब यहाँ से असल कहानी शुरू होती है
गांव मे प्रवेश करते ही मैं अपने हरवाह एतवारी चाचा से मिलते हुए अपनी नागिया दीदी जो।अब इस दुनियां मे नहीं है,उनके घर पहुंच जाता उनका पैर छू कर प्रणाम करता वो गदगद हो जाती बहुत सारा आशीर्वाद देती और कहती जा साहेब बनकर पूरा गावं का नाम रौशन करिह,,,नागिया दीदी मेरे उम्र की पुरे गावं की बच्चे दीदी थी ,,,वह पूरे गांव की बेटी थी,पहले नहीं बाद जाना।की वह जाति की कुम्हार जामुन का की बेटी थी,जामुन का को कोई और संतान नहीं था इसलिये वः अपने पति हिरा पाहून के साथ अपने मइके मे ही रहती थी,,,,,नागिया दीदी के घर के सामने एक छोटा सा खेल का।मैदान था ,हम बच्चे शाम सुबह खेला करते थे यथा,,,गिल्ली डंडा, पीटो, चोर सिपाही,दोल पता,,,बच्चियां गाना गोटी
दिन खेलते खलते जब प्यास ला जाती तो नागिया दीदी के यहाँ जाकर पानी पीता,लेकिन नागिया दीदी केवल पानी नहीं देती भैसे के ढूधके बने पेड़े पहले देती तब पानी,,,और तो और मैं जब खेलते खेलते पसीने से लथपथ हो जाता तो अपने आँचल से मेरे मुंह के पसीने पोछती,,,स्नेहमयी ममता मयी दीदी आज भी याद
वह पूरे गावं की बेटी थीं, पुरे गांव की दीदी थी ,बचपन मे कुछ आदमी को पता नहीं होता कि वह किस जाति का है किस बिरादर।का है,,,लेकिन आज हर जगह जाति बिरादरी की बात होती है,,,क्या आधुनिकता के नाम पर समाज बिखरता जा रहा है,,,
क्या स्नेह ,प्रेम ,ममता की भैया कोई जाति होती है खैर
बिशेष अगले अंक मे,, शंकर स्नेहिल

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