SHANKER SNEHIL की एक लघु कथा-2

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मेरी माँ कहा करती थी ” एक मन विद्या सम्हारय लेल नौ मन बुद्धि चाही”
बक्सर के डी एम मुकेश कुमार पांडे की खुदकुशी की खबर ,विजयपत सिंघानिया जो कि रेमंड के स्वामी रहे है वो आजकल 1 -1 पैसे के मोहताज है, ऋतुराज साहनी की माँ का कंकाल डेढ़ साल बाद मिलना इत्यादि विषय फिर चर्चा में है । कारण शायद एक ही है….लार्ड मेकाले साहब की शिक्षा पद्धति जिसमे सब कुछ की डिग्री है अगर नही है तो दुनियादारी का डिप्लोमा, वो डिप्लोमा है विवेक का डिप्लोमा,संस्कार का डिप्लोमा.सदाचार का डिप्लोमा.संवेदना का डिप्लोमा । इस सब डिग्री के बिना सब डिग्री बेकार है । इन सब के बिना छात्र या तो मुकेश कुमार पांडे बनता है या फिर ऋतुराज साहनी या फिर Gautam Singhania या फिर कोई और ….मैंने अपने जीवन मे एक मरखहवा माता-पिता जो कि बदकिस्मती से मास्टर भी थे उनको देखा है जो बच्चे के पढाई लिखाई के मसले को हमेशा कपार पर उठाये रहते थे । माघ के जाड़े में भी उनको देखकर जेठ की दोपहर का अहसास होता है । एक दिन बच्चे ने 13 सते 98 क्या कह दिया….बाप रे इतना मारे की बच्चे को हल्दी वाला गरम दूध पीना पडा तब जाकर जान मे जान आई थी ।
आज भले उसे नौ का पहाड़ा याद नहीं लेकिन मरखहवा मास्टर बाप का नाम सुनते ही तेरह का पहाड़ा तेरह बार पढ़ देता है।
तो साहेब.. हुआ क्या की.. .गाँव भर में शोर था कि उस बच्चे से पढ़ने में तेज तो पूरे जिले-जवार में कोई नहीं है.बाइस घण्टा हनहना के पढ़ता है.फिजिक्स आ केमेस्ट्री का तो केथरी बना रखा है.मैथमैटीक्स त शरबत जइसा घोर के पी गया है.. सब परीक्षा में फस किलास आता है..उसको कलेक्टर बनने से काली माई भी नहीं रोक सकतीं..लाल बत्ती हनहनाता हुआ जहिया गांव में आया बुझ लीजिये कि ओह दिन में गाँव में गरदा हो जाएगा” इतना कहने के बाद सभी लोग एक स्वर में कहते.”.हाँ तो मने बेटा हो तो मास्टर साहेब के बेटा के जइसा..किस्मत हो तो उसके मरखहवा बाप माँ के जइसा..”
इस उम्मीद आ तारीफ़ के कारण मास्टर साहेब भी उसको भोरे 4 बजे से रात के 11 बजे तक खूब पढ़ाए.बारहवीं तक कहीं घर से आने-जाने नहीं दिए मामा मौसी के बियाह तक मे नहीँ..बस स्कूल से किताब,किताब से कोचिंग,कोचिंग से ट्यूशन,ट्यूशन से घर,घर से स्कूल..
बारहवी तक लड़के ने इसी माहौल में बिल्कुल एक यंत्र की भांति पढ़ाई किया. एक दिन हुआ ऐसा कि परम्परा के अनुसार.बीटेक में एडमिशन हो गया.बीटेक में एडमिशन हुआ..तो परम्परा के अनुसार आकर्षक सैलरी का ऑफर भी आ गया.फिर खूब बढ़िया Salary वाली Job भी मिल गयी..कुछ दिन बाद बियाह हुआ तो बढ़िया नौकरी करने वाली कनिया भी मिल गयी.लेकिन साहेब..आजकल मास्टर साहेब बड़े खिन्न रहते हैं. बड़का बेटा उनको गरियाता है. पतोहू जिसे प्यार से वो बौआसिन कहतें हैं रोज उनके मरने की कामना करते हुए अपने किस्मत को कोसती है.सास ससुर से एक छन नहीं पटता है..फलस्वरूप उस लड़के ने अपने आप को अपने माँ-बाबूजी से दूर कर लिया है. अब तो सालों हो गए,गाँव भी नही आता.फिर क्या.जिस बाप की कभी तूती बोलती थी वो आजकल अपने दुआर पर दीन-हीन की तरह मुंह लटकाए बैठे रहतें हैं..जिस बेटे को लेकर कभी गर्व महसूस करते थे.उसको लेकर अब शर्मिंदा हैं.
लेकिन ये सिर्फ एक बाप या एक ही माँ की कहानी नही है..जरा नज़र दौड़ाइये विजयपत सिंघानिया साहेब , ऋतुराज साहनी जी की माँ जैसे दो-चार दस लोग आपको हर गाँव,हर टोले-मोहल्ले में मिल जाएंगे.आज हर शहर में धड़ल्ले से एक बिल्डिंग बन रही..जिसकी नींव में सीमेंट बालू नहीं सिंघानिया माँ बाप वाली कहानीयों को डाला जा रहा है.और दुनिया बड़े ही संस्कारपूर्वक उसे वृद्धाआश्रम कह रही है.
विजयपत सिंघानिया के लिए आप क्या कहेंगे.. ?..दोष तो पूरा विजयपत सिंघानिया का है न ? ऋतुराज साहनी की माँ के बारे में क्या कहतें हैं आप ?..
बिल्कुल आप सही कहतें हैं…जीवन भर तो बेटे को किताबों में उलझाये रहे.. डिग्री पर डिग्री, व्यापार पर व्यापार सिखाते रहे. व्यापार सिखाते-सिखाते अपने बेटे को पइसा कमाने वाली मशीन बना दिए..बस आदमी बनाना भूल गए.और ये भी भूल गए कि हमारे पुरखे-पुरनीयों ने एक कहावत कहा है की “बौआ रे एक मन विद्या के नौ मन बुद्धि चाही..वो भूल गए की बेटा-बेटी को सभी डिग्री के बाद संस्कृति की डिग्री हासिल होनी चाहिए
बस किताब से रटकर फर्स्ट क्लास पास होना.और व्यापार करना ही जीवन का अंतिम लक्ष्य रह गया है.
आज विजयपत सिंघानिया जैसे बाप या ऋतुराज साहनी जैसों की माँ धड़ल्ले से अपने-अपने बेटे को पैसा कमाने वाली मशीन बना रहे हैं. आप जरा नज़र दौड़ाइए..जितनी तेजी से देश में ये मशीने बन रहीं..उतनी ही तेजी से वृद्धाआश्रम बन रहे हैं..क्या है कि विजयपत सिंघानिया साहेब हो या उनका लड़का सबको सिखने की जरूरत है.
गुजरात के उस अरबपति हीरा व्यापारी से…जिसने एक दिन अमेरिका में MBA करने वाले अपने बाइस वर्षीय बेटे से सभी सुविधाएं छिनकर ये कह दिया की “पढ़ाई लिखाई को थोड़ा रोको और जाओ..बिना पैसे खर्च किये कुछ कमाकर लाओ..”कहते हैं उनके लड़के के नाम Dravya Dholakia था, धृव्य ढोलकिया जिनके बाप का सैकड़ों देशों में कारोबार फैला हुआ है..अरे वही बाप Savji Dholakia जी .जिनका नाम दीपावली आते ही इलेक्ट्रानिक और प्रिंट मीडिया में दिए की भाँति चमकने लगता है.जो अपने कम्पनी के कर्मचारियों से इतना प्रेम करतें है की हर दिवाली में हजारों Car से लेकर हजारों flat तक गिफ्ट कर देते हैं.एक दिन उसी अमीर बाप ने अपने बेटे को 7 हजार रुपए दिया
और सामने तीन शर्त रख दिया… पहली शर्त ये थी कि वह किसी गैर भाषी प्रांत में रहेगा.बिल्कुल अनजान लोग,भाषा और माहौल के बीच…और वहाँ भी कहीं एक हफ्ते से ज्यादा काम नहीं करेगा, दूसरी यह कि वह कहीं पर भी अपने पिता के नाम का इस्तेमाल नहीं करेगा..तीसरा यह कि वह ना तो मोबाइल इस्तेमाल करेगा और ना ही दिए गए 7 हजार रुपए।

कहते हैं..इस घटना के बाद धृव्य ने एक इंटरव्यू दिया..और कुछ बड़ी हीं गौर करने लायक बातें कहीं जो मास्टर साहेब और उनका लड़का टाइप दोनों लोगो को जानना चाहिये…उसने कहा की
“मैं एक महीने तक कोच्चि में काम करने के बाद वापस आ गया” 5 दिनों तक मुझे ना तो काम मिला ना ही रहने के लिए कोई जगह। लगभग 60 जगहों पर अप्लाई करने के बावजूद मुझे किसी ने काम नहीं दिया।फिर बड़ी मुश्किल से बेकरी में काम किया फिर एक कॉल सेंटर में फिर वह एक जूते की दुकान पर..और आखिरी में McDonald पहुंचा। इस तरह संघर्ष करके बस चार हजार रुपये कमाए..
लेकिन इस घटना के बाद मेरे अंदर वो ताकत मिली जो आजतक किसी किताब ने नही सिखाया था..वो थी रीजेक्शन को झेलने की ताकत.बार-बार असफल होने की ताकत..किताब से हटकर दुनिया और लोग को नजदीक से समझने की ताकत..बार-बार गिरकर उठने की ताकत..बिना किसी के सहारे खड़े होने की ताकत..”
विजयपत सिंघानिया के बेटे को उस सुंदर पिचाई से सीखना चाहिए..वही Google के Ceo सुंदर पिचाई..अभी वो IIT खड़गपुर आए थे.. और एक सवाल के जबाब में कह गए कि “दुनियादारी का ज्ञान किताबों के ज्ञान से ज्यादा जरूरी है..जीवन भर किताब और फर्स्ट डिविजन हमें ज्ञान और पैसा तो दे सकते हैं.लेकिन इस ज्ञान और पैसे का सदुपयोग करने के लिए विवेक नहीं..कभी सुंदर सी ग्रेड आते थे .लेकिन आज सफलता के शिखर पर हैं,वहां,जहाँ से हर चीज छोटी नज़र आती है.. ये भी कहा कि सफलता हमेशा मार्कशीट देखकर नहीं आती। स्मार्ट तरीके से मेहनत करने से आती है.गधे जैसे मेहनत करने से नहीं.. सुंदर ने आगे कहा की “उनको तो यह सुनकर आश्चर्य होता है कि भारत में आठवीं कक्षा का बच्चा आज आइआइटी की तैयारी कर रहा है।
बस सुंदर साहेब ने अभी कुछ देखा ही नहीं.वो मेरे मोहल्ले के एक इंग्लिश मीडियम स्कूल में आए होते..तो दांतों ऊँगली दबा लेते.दो-दो,तीन-तीन साल के बच्चे चिल्ला रहे हैं.लेकिन उनकी क्यूट सी मम्मा अपने क्यूट से मुन्नू के पीठ पर बस्ते को लादे जा रही हैं..बच्चा चिल्ला रहा.रो रहा.छटपटा रहा..और वो पास खड़ी आँटी से मुंह चमकाके कहे जा रहीं…”मेला लाजा बेटा तो इंजीनीयर बनेगा..”
अरे ! बस करिये महराज.क्या ख़ाक बनेगा.आपका यही हाल रहा तो भगवान न करे.. आपका हाल भी मास्टर का हाल हो जाएगा.
अरे ! अभी कितना छोटा है,कितना मासूम.आपकी गोद से बढ़कर कोई स्कूल हो सकता क्या है उसके लिए.?.अपने पास ही जमकर खेलने दीजिये न.गिरने दिजिये.उठने दीजिये.बनाने और बिगाड़ने दिजिये..फेंकने और पटकने दीजिये.उसके हाथ से गिलास न लीजिए..उसे मिट्टी दीजिये और कहिये की एक मिट्टी का सुंदर सा गिलास बनाकर लाओ..बस..आदमी बनने की पहली क्लास उसी दिन शुरु हो जायेगी..एक संवेदनशील आदमी.क्योंकि ये संवेदनशीलता तभी आएगी..जब कुछ सृजनशीलता आएगी..जब सृजन आएगा तब विवेक आएगा.जब विवेक आएगा तभी ज्ञान की सार्थकता होगी.
इन इंग्लिश मीडियम स्कूलों के चक्कर में ज्यादा मत पड़िये..दरअसल ये बाजारवाद का चमत्कार है..जिसके भयंकर मकड़ जाल में आप फंस गये हैं.आप ध्यान से देखेंगे तो वहाँ बड़ी ही गहरे में एक साजिश चल रही है..आपके बच्चे को आपके भाषा,संस्कृति,संस्कार और संवेदना से दूर करने की.आप जानिये की वहां आज रट्टू तोते बनाए जा रहे हैं..और ये भी जानिये की रट्टू तोते कभी सृजन नहीं करते.
इतिहास गवाह है..जरा उठाकर देखियेगा ..कितनों के नाम गिनाऊँ..अधिकतर महान लोग जिन्होंने अपने सृजन से दुनिया को बदल कर रख दिया है वो या तो कालेज नहीं गए या कालेज के सबसे गधे छात्र रहे हैं..या बीच में ही कालेज छोड़ दिया है…..जरा आँखें खोलिए.ये किताबों का बोझ कम करिये.
वरना क्या पता ईश्वर न करे की आपको विजयपत सिंघानिया साहेब की तरह उदास रहना पड़े..ईश्वर ने करे की किसी दिन पैसे की मशीन बन गया आपका बेटा आपके शहर का वृद्धाआश्रम आपके लिए बुक कर आए या आपके कंकाल बनने के दो साल बाद आये |

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