A book by Manik Munde

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A book by Manik Munde

जो पहिरावै सोई पहरूं, जो दे सोई खाऊं।
मेरी उनकी प्रीत पुराणी, उन बिन पल न रहाऊं।
प्रेमी या भक्त अपनी आकांक्षा हटा लेता है।आकांक्षा होगी तो प्रेम में कमी रह जाती है। आकांक्षा होगी तो हम अपनी मर्जी से कुछ करवाना चाहेंगे।
भक्त कहता है, ‘तेरी मर्जी, मेरा जीवन। तेरी मर्जी, मेरा अनुशासन।’ मीरा भक्त है; मीरा भक्ति है। कहती है, ‘जो तुम दे देते हो भगवान, वही मेरे लिए काफ़ी; मुझे अन्यथा कुछ भी नहीं चाहिए।’
जैसे-जैसे प्रेम का संबंध गहरा होता है; भक्त का हृदय परमात्मा के करीब धड़कने लगता है; वैसे-वैसे पता लगता है कि जन्मों-जन्मों में इसी को तो खोज रहा था।यह प्रीत पुरानी है। यह कोई नई खोज नहीं है।
आदमी किसी और को भी प्रेम करता है तो उसमें परमात्मा को ही खोजता है और यह अकेली मीरा का ही अनुभव नहीं है। जिन्होंने भी जाना है उन सभी का अनुभव यही है कि हमारा हर प्रेम परमात्मा की ही तलाश है। यहाँ तक कि आदमी को पद में भी परम पद की ही आकांक्षा रहती है।धन की खोज में भी वही मंशा रहती है। तलाश चाहे गलत दिशा में हो कि ठीक दिशा में; हर तलाश उसी की तलाश है। अन्य कोई भी रिश्ता हमें तृप्त नहीं कर पाता । इसलिए नहीं कर सकता कि हम उसे संसार में खोजते हैं; सागर को बूंद में खोजते हैं।
जिसे परमात्मा की थोड़ी-थोड़ी झलक मिलने लगती है उसे पल भी उसके बिना रहना अच्छा नहीं लगता। इसलिए मीरा कहती है कि ‘उसके बिना एक पल भी न रहूँगी।’

मीरा: भक्ति का अमिरस
चिंतन ग्रंथ :माणिक मुंडे

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