Assam: महात्मा गांधी ने कहा था- “असमिया महिलाएं अपने करघों पर सपनों को बुनती हैं।” ये बात डिब्रूगढ़ जिले के मोरान की कुशल बुनकर हेमोप्रोवा चुटिया के काम में साफ नजर आ रही है। दशकों तक अपने पारंपरिक करघे पर कपड़े बुनने के बाद उन्होंने 2013 में पवित्र ग्रंथों को कपड़े पर उकेरना शुरू किया।
उन्होंने भगवद गीता से शुरुआत की, कपड़े पर संस्कृत के श्लोकों को कुशलतापूर्वक उकेरा और बाद में यही काम अंग्रेजी में भी किया, हर एक अक्षर को धागे के साथ बड़ी ही सावधानी से बनाया जाता है। इसमें न तो छपाई का इस्तेमाल होता है और न ही किसी औजार या मशीनी तकनीक का।
हेमोप्रोवा को इस काम के लिए किसी दूसरे की मदद की जरूरत नहीं है। इसके लिए सालों के अभ्यास के बूते उनकी पारखी निगाहें, हाथ और कल्पना ही काफी है। उन्हें 2023 में पद्म श्री से सम्मानित किया गया था। लेकिन हेमोप्रोवा बताती हैं कि पुरस्कार जीतना कभी उनका लक्ष्य नहीं था; उनका असली जुनून तो अपने करघे पर बुनाई करने में है।
फिलहाल वो अपने सबसे पसंदीदा प्रोजेक्ट पर काम कर रही हैं। उन्होंने भगवान कृष्ण की स्तुति में रचित 16वीं शताब्दी के असमिया भक्ति ग्रंथ ‘नाम घोष’ का अंग्रेजी और हिंदी में अनुवाद शुरू किया है। हेमोप्रोवा, न तो अंग्रेजी समझती है, न हिंदी और न ही संस्कृत। लेकिन उसके द्वारा बुने गए शब्द मूल पाठ के बिल्कुल सटीक होते हैं, क्योंकि उन्होंने अवलोकन के माध्यम से प्रत्येक अक्षर को हूबहू बनाना सीख लिया है।
उसके लिए अक्षर डिजाइन हैं, जिन्हें बड़ी सावधानी और लगन से बुनना पड़ता है, हेमोप्रोवा चुटिया अपना ज्यादातर समय हथकरघे पर बिताती हैं। जो उनके घर में एक विशेष स्थान रखता है। ये उनके घर में पूजा स्थल के पवित्र स्थान के बराबर है, उनकी इच्छा है कि युवा पीढ़ी पारंपरिक करघे के जरिए अपने सपनों को कपड़े पर बुनती रहे… महात्मा गांधी से मिली इस विरासत को हमेशा जीवित रखे।