Chinese visa: चीनी वीजा मामला. अदालत ने कार्ति चिदंबरम की याचिका पर CBI से जवाब किया तलब

Chinese visa:  दिल्ली उच्च न्यायालय ने कथित चीनी वीजा मामले में निचली अदालत द्वारा भ्रष्टाचार और षड्यंत्र का आरोप तय करने के आदेश के खिलाफ कांग्रेस सांसद कार्ति चिदंबरम की ओर से दाखिल याचिका पर बुधवार को केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) से जवाब तलब किया।

न्यायमूर्ति मनोज जैन की पीठ ने हालांकि इस स्तर पर निचली अदालत की कार्यवाही पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। साथ ही कार्ति की ओर से राहत के लिए दाखिल याचिका पर नोटिस जारी किया। शिवगंगा से लोकसभा सदस्य चिदंबरम की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता ने दलील दी कि उनके मुवक्किल के खिलाफ कोई मामला नहीं बनता, इसके बावजूद निचली अदालत में चार फरवरी को मामले की सुनवाई निर्धारित है।

इस पर अदालत ने मौखिक टिप्पणी की, ‘‘इस पर रोक नहीं लगाई जा सकती। हमारा मानना है कि कार्यवाही रोकी नहीं जानी चाहिए। मुकदमे को चलने देना चाहिए।’’ अदालत ने 12 फरवरी को अगली सुनवाई से पहले सीबीआई को संक्षिप्त जवाब देने या यथास्थिति रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया।

सीबीआई के वकील ने कहा कि चार फरवरी को निचली अदालत में मामला केवल कुछ प्रक्रियात्मक औपचारिकताओं के लिए सूचीबद्ध है। कार्ति चिदंबरम की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा ने दलील दी कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा आठ और नौ के तहत 50 लाख रुपये की कथित रिश्वत का आरोप लगाया गया है, लेकिन किसी भी लोक सेवक को न तो आरोपी बनाया गया है और न ही उनकी पहचान की गई है।

उन्होंने कहा कि पूरा मामला एक सरकारी गवाह के बयान पर आधारित है और रिश्वत की मांग या स्वीकार किए जाने का कोई ठोस सबूत नहीं है। एक निचली अदालत ने 23 दिसंबर 2025 को इस मामले में कार्ति चिदंबरम और छह अन्य के खिलाफ आपराधिक साजिश और भ्रष्टाचार के आरोप तय करने का आदेश दिया था। अदालत ने कहा था कि भारतीय दंड संहिता की धारा 120-बी (आपराधिक साजिश) और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 8 और 9 के तहत कार्ति चिदंबरम के खिलाफ आरोप तय करने के लिए प्रथम दृष्टया पर्याप्त सामग्री मौजूद है।

उच्च न्यायालय में दायर याचिका में कार्ति चिदंबरम ने कहा कि निचली अदालत ने रिकॉर्ड पर मौजूद दस्तावेजों, साक्ष्यों और गवाहों के बयानों पर समुचित रूप से विचार नहीं किया और उन तथ्यों की अनदेखी की, जो अपराध की अनुपस्थिति दर्शाते हैं। याचिका में कहा गया कि जांच एजेंसी द्वारा लगाए गए आरोपों के विपरीत, न तो कोई रिश्वतखोरी हुई और न ही कोई साजिश रची गई थी।

अक्षत गुप्ता के जरिये दाखिल याचिका में कहा गया, “किसी आरोपी द्वारा धन या ऐसी किसी मांग, उसका भुगतान और स्वीकार किया जाना साबित होना आवश्यक है। ऐसा प्रतीत होता है कि निचली अदालत ने यह गलत निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्ता ने कार्य के लिए 50 लाख रुपये की मांग की थी। रिश्वत मांगने का तो आरोप तक नहीं है, सबूत तो दूर की बात है।”

याचिका में कहा गया कि निचली अदालत इस तथ्य पर संज्ञान लेने में विफल रही कि वीजा का ‘पुनः उपयोग’ पहले से प्रचलित व्यवस्था थी और किसी प्रशासनिक स्पष्टीकरण के लिए साजिश की आवश्यकता नहीं थी। सीबीआई ने वर्ष 2022 में दर्ज एफआईआर के आधार पर दो साल की जांच के बाद आरोपपत्र दाखिल किया था।

एजेंसी के अनुसार, पंजाब स्थित टीएसपीएल 1,980 मेगावाट की ताप विद्युत परियोजना स्थापित कर रही थी, जिसका ठेका चीनी कंपनी शानडोंग इलेक्ट्रिक पावर कंस्ट्रक्शन कॉर्प (सेप्को) को दिया गया था। परियोजना में देरी हो रही थी और कंपनी पर जुर्माना लगने की आशंका थी। सीबीआई की प्राथमिकी के अनुसार, टीएसपीएल के एक अधिकारी ने कार्ति चिदंबरम से उनके कथित करीबी सहयोगी और बिचौलिये एस. भास्कररमन के जरिए संपर्क किया था। आरोपपत्र में कार्ति चिदंबरम के अलावा उनके कथित करीबी सहयोगी और चार्टर्ड अकाउंटेंट एस. भास्कररमन, वेदांता की अनुषंगी टीएसपीएल और मुंबई स्थित बेल टूल्स को भी आरोपी बनाया गया है, जिनके जरिए कथित तौर पर रिश्वत की रकम भेजी गई।

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