IDBI बैंक के प्रस्तावित विनिवेश को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने बैंक की हिस्सेदारी बेचने के केंद्र सरकार के फैसले पर आपत्ति जताते हुए कर्मचारियों के हितों और अधिकारों को लेकर चिंता व्यक्त की है। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस के शासनकाल में देश के औद्योगिक विकास को मजबूत करने के लिए बैंक स्थापित किए गए, जबकि मौजूदा सरकार सार्वजनिक क्षेत्र की बैंकिंग संस्थाओं को निजी हाथों में सौंप रही है।
राहुल गांधी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर अपनी प्रतिक्रिया साझा करते हुए IDBI बैंक के कर्मचारियों के प्रति एकजुटता जाहिर की। उन्होंने बैंक की स्थापना और मौजूदा विनिवेश प्रक्रिया का जिक्र करते हुए कांग्रेस तथा मोदी सरकार की नीतियों के बीच अंतर बताया।
उन्होंने अपने पोस्ट में कहा कि IDBI बैंक की स्थापना कांग्रेस शासन के दौरान देश के उद्योगों को वित्तीय मजबूती देने के उद्देश्य से हुई थी। उनके मुताबिक, उस समय नए बैंक स्थापित करने पर जोर था, जबकि मौजूदा सरकार के कार्यकाल में सार्वजनिक बैंकों की बिक्री की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है। राहुल गांधी ने स्पष्ट किया कि वह IDBI बैंक के कर्मचारियों के साथ खड़े हैं।
कर्मचारियों के आरक्षण और सेवा सुरक्षा पर जताई चिंता
राहुल गांधी ने बैंक कर्मचारियों के नाम एक पत्र जारी कर निजीकरण के संभावित प्रभावों पर भी सवाल उठाए। उन्होंने बताया कि मार्च 2025 में IDBI बैंक के कुछ कर्मचारी उनसे संसद भवन में मिले थे। उस मुलाकात में कर्मचारियों ने बैंक की वित्तीय स्थिति बेहतर होने के बावजूद उसके विनिवेश का फैसला लेने के पीछे सरकार की मंशा पर सवाल किया था।
राहुल गांधी के अनुसार, कर्मचारियों की चिंताओं को उन्होंने लोकसभा में भी उठाया था। उन्होंने सरकार से यह जानना चाहा था कि मुनाफे में चल रहे सार्वजनिक बैंक को बेचने की आवश्यकता क्यों है और इस प्रक्रिया में कर्मचारियों तथा खाताधारकों के हितों की रक्षा किस तरह की जाएगी। उन्होंने अपने पत्र में दावा किया कि सरकार अब IDBI बैंक की हिस्सेदारी कनाडा की कंपनी Fairfax को बेचने की तैयारी कर रही है। राहुल गांधी ने आशंका जताई कि निजी स्वामित्व आने के बाद बैंक में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए लागू आरक्षण व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
उन्होंने यह भी कहा कि कर्मचारियों की मौजूदा सेवा शर्तों और नौकरी से जुड़े संरक्षण पर निजीकरण का असर पड़ने की आशंका है। राहुल गांधी ने सार्वजनिक क्षेत्र की भूमिका पर जोर देते हुए कहा कि सरकारी बैंक केवल आर्थिक संपत्ति नहीं हैं, बल्कि देश के विकास और निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। उन्होंने सार्वजनिक और निजी क्षेत्र को साथ लेकर चलने की नीति का समर्थन किया।
52,878 करोड़ रुपये का है IDBI बैंक का प्रस्तावित सौदा
IDBI बैंक के विनिवेश की प्रक्रिया में 14 अक्टूबर को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 52,878 करोड़ रुपये (लगभग 5.56 अरब डॉलर) के प्रस्ताव को मंजूरी दी थी। इस सौदे के तहत बैंक की 60.72 प्रतिशत नियंत्रक हिस्सेदारी कनाडा की Fairfax Financial Holdings की एक सहायक कंपनी को हस्तांतरित की जानी है। इसमें केंद्र सरकार अपनी 30.48 प्रतिशत और भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) अपनी 30.24 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचेगा। लेनदेन पूरा होने के बाद बैंक में केंद्र सरकार की हिस्सेदारी 15 प्रतिशत और LIC की हिस्सेदारी 19 प्रतिशत रह जाएगी।
आरक्षित मूल्य में बदलाव की खबरों पर वित्त मंत्रालय ने दी सफाई
IDBI बैंक के विनिवेश को लेकर उठ रहे सवालों के बीच वित्त मंत्रालय ने बोली प्रक्रिया से जुड़ी स्थिति स्पष्ट की। मंत्रालय ने कहा कि दूसरे चरण की बोली में बैंक का आरक्षित मूल्य न तो घटाया गया और न ही बढ़ाया गया। हालांकि, संशोधित बोली प्रक्रिया के परिणामस्वरूप सामने आई बोली की कीमत में 3,917 करोड़ रुपये की बढ़ोतरी हुई। मंत्रालय ने बताया कि दूसरे चरण में सर्वश्रेष्ठ प्रस्ताव आमंत्रित करने की प्रक्रिया विनिवेश संबंधी सचिवों के मुख्य समूह (CGD) की ओर से तय की गई थी। इस समूह को आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (CCEA) ने रणनीतिक विनिवेश से जुड़े मामलों में प्रक्रियागत अड़चनों को दूर करने और आवश्यक बदलाव करने का अधिकार दिया था।
वित्त मंत्रालय के मुताबिक, शुरुआती बोली प्रक्रिया वित्त वर्ष 2025-26 में निवेश एवं सार्वजनिक संपत्ति प्रबंधन विभाग (DIPAM) के सांकेतिक दिशानिर्देशों के आधार पर आयोजित की गई थी। इन दिशा-निर्देशों में जटिल रणनीतिक लेनदेन के लिए प्रक्रिया में जरूरी लचीलापन रखने का प्रावधान है। IDBI बैंक के प्रस्तावित निजीकरण को लेकर कर्मचारियों के बीच आरक्षण, नौकरी की शर्तों और पेंशन संबंधी लाभों को लेकर चिंताएं बनी हुई हैं। वहीं, सरकार ने बोली प्रक्रिया और आरक्षित मूल्य को लेकर उठे सवालों पर अपना पक्ष रखा है। इस घटनाक्रम ने बैंक के विनिवेश को लेकर राजनीतिक और आर्थिक बहस को और तेज कर दिया है।