Gujarat: गुजरात में प्राकृतिक खेती के जरिए हल्दी की पैदावार 40 टन प्रति हेक्टेयर से ज्यादा रही, जो पारंपरिक रासायनिक खेती में दर्ज 19.3 टन की पैदावार से दोगुने से भी अधिक है। ये नतीजे गुजरात बायोटेक्नोलॉजी रिसर्च सेंटर और सरदारकृषिनगर दंतीवाड़ा कृषि विश्वविद्यालय के संयुक्त वैज्ञानिक शोध पर आधारित हैं, जो प्राकृतिक खेती की संभावनाओं को उजागर करते हैं। इस बीच मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल के नेतृत्व में गुजरात सरकार पूरे राज्य में कम लागत वाली प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए काम कर रही है।
अध्ययन में ये भी पाया गया कि प्राकृतिक खेती से कहीं बेहतर मुनाफा मिलता है। इसमें प्रति हेक्टेयर शुद्ध कमाई 10.5 लाख रुपये से अधिक रही, जबकि पारंपरिक खेती में यह लगभग 3.61 लाख रुपये थी।
इस शोध में बीजामृत, जीवामृत और घनजीवामृत जैसे प्राकृतिक इनपुट का इस्तेमाल किया गया, साथ ही गेहूं के भूसे से मल्चिंग (मिट्टी को ढकना) भी की गई। वैज्ञानिकों ने इन इनपुट का विश्लेषण करके ऐसे लाभकारी सूक्ष्मजीवों और मेटाबोलाइट्स की पहचान की, जो मिट्टी की सेहत और पौधों के विकास में मददगार हो सकते हैं।
शोध के इन नतीजों को प्रयोगशाला से खेतों तक पहुंचाते हुए सरदारकृषिनगर दंतीवाड़ा कृषि विश्वविद्यालय किसानों को प्राकृतिक खेती के तरीकों का प्रशिक्षण दे रहा है।
इस पहल के तहत हल्दी की खेती और उसमें ‘वैल्यू एडिशन’ (मूल्यवर्धन) के बारे में भी मार्गदर्शन दिया जा रहा है, जिससे किसानों को अपनी उत्पादकता और मुनाफा दोनों बढ़ाने में मदद मिल रही है।
हल्दी की अधिक पैदावार, बेहतर मुनाफा और मिट्टी की सेहत के लिए संभावित फायदों को देखते हुए ये शोध प्राकृतिक खेती की अहमियत को साबित करता है। इन वैज्ञानिक नतीजों को प्रयोगशाला से खेतों तक पहुंचाकर, गुजरात हल्दी की खेती को ज्यादा टिकाऊ और लाभदायक बनाने की राह प्रशस्त कर रहा है।