Dussehra: देशभर में दशहरे पर रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले जलाए जाते हैं, लेकिन मध्य प्रदेश के राजगढ़ जिले के भाटखेड़ी गांव में परंपरा अलग है। यहां के लोग दशहरे पर रावण और उसके भाई कुंभकर्ण की पूजा करते हैं। ग्रामीण उन्हें देवताओं की तरह मानते हैं। गांव की यह अनोखी परंपरा इसे दूसरे स्थानों से अलग बनाती है।
स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि “हमको अजीब नहीं लगता। हमें बड़ी खुशी होती है कि हमें जो पात्र बनता है उसको है जो राम-रावण के युद्ध करवा को उसको मारते हैं। हम जो प्रतिमा बनी है उसको कुछ छेड़-छाड़ नहीं करते हैं। इसके पास में हम आरती हवन-पूजन करके घर को जाते हैं। कई जगह जो मिट्टी का रावण बनाकर लोग पत्थक मारते हैं उसको तोड़ देते हैं। परंतु हमारे बुजुर्गों ने ऐसा नहीं किया। अब वो उनके बारे से है और वो प्राण प्रतिष्ठा ऐसी हो गई उनकी कि जो वो हमारी मन्नतें पूरी करे, तो हम उनको छेड़-छाड़ क्यों करेंगे।”
“हम इसलिए पूजते हैं क्योंकि कई विगत वर्षों से जो हमारे बुजुर्ग पुराने लोग हैं जो पूजा कर रहे हैं यही परंपरा चली आ रही है। इसलिए हमें ऐसा अजीब नहीं लगता है। कोई मन्नत वगैरह आदमी की इच्छा पूरी होती है। मन्नत पूरी होती है तो वही आदमी उसको भगवान मानता है। तो लोगों की बहुत से की मन्नत पूरी हुई। तो इसी कारण सभी आते हैं और यहां पर अपनी मन्नतें करते हैं और पूरी होती है तो फिर प्रसाद वगैरह चढ़ाते हैं।”
ग्रामीणों का मानना है कि रेलवे ट्रैक के पास बनी रावण और कुंभकर्ण की दोनों मूर्तियां करीब 150 साल पुरानी हैं। भाटखेड़ी गांव में दशहरे का उत्सव रामलीला से शुरू होता है। इसमें रामायण का मंचन किया जाता है और रावण वध का दृश्य दिखाया जाता है, लेकिन देश के दूसरे हिस्सों से अलग, यहां रावण और कुंभकर्ण के पुतले नहीं जलाए जाते। इसके बजाय, गांव के लोग उनकी मूर्तियों के पास जाकर पूजा करते हैं और प्रार्थना करते हैं।