Jaipur: राजस्थान की राजधानी जयपुर के पास सांभर झील के बीच स्थित, देवी शाकंभरी को समर्पित यह मंदिर कई पौराणिक कथाओं से जुड़ा है। माना जाता है कि यह मंदिर छठी सदी का है। स्थानीय लोककथाओं के मुताबिक चौहान वंश के संस्थापक राजा वासुदेव की भक्ति से प्रसन्न होकर माता शाकंभरी उनके सामने प्रकट हुईं। माता के आशीर्वाद से ही यहां सांभर झील का निर्माण हुआ। चौहान वंश ने वर्तमान राजस्थान के कुछ हिस्सों पर शासन किया था।
शाकंभरी माता मंदिर के प्रबंधक अजय कुमार जोपट ने बताया कि “ये सब छठी शताब्दी का मंदिर है और वासुदेव जी चौहान जो उनको चौहान शासन का संस्थापक माना जाता है वासुदेव जी को उन्हे माता जी ने यहां पर दर्शन दिए और तब से ये मंदिर धीरे-धीरे जोरदार होता जा रहा है, बढ़ता जा रहा है। आज काफी सुविधाएं हो गई हैं। जंगल में हैं और आने वाले यात्रियों को दुख नहीं है, कोई दिखक्कत नहीं, कोई कष्ट नहीं है।”
शाकंभरी माता हिंदू धर्म में देवी दुर्गा का ही एक रूप मानी जाती हैं, जो वनस्पति, शाकाहार और संसार के पोषण की देवी हैं। मंदिर में एक ‘अखंड ज्योति’ यानी कभी न बुझने वाली लौ जलती रहती है। इससे जुड़ी एक दिलचस्प लोक-कथा प्रचलित है। कहा जाता है कि मुगल बादशाह जहांगीर ने इस मंदिर में आकर देवी की शक्तियों की परीक्षा लेने का फैसला किया। उसने यह देखने के लिए कि क्या लौ जलती रहती है, उसके ऊपर लोहे के सात तवे रखवा दिए। मान्यताओं के अनुसार, तवे रखे जाने के बावजूद वो लौ जलती रही।
प्रबंधक अजय कुमार जोपट ने बताया कि “उन्होंने (बादशाह जहांगीर ने) कहा कि अगर अखंड ज्योत जलती है यहां पर उसके ऊपर सात लोहे के तवे रख दिए उन्होंने कि अगर सातों तवों को फाड़कर लौ बाहर आ जाएगी तो माता जी को मान जाऊंगा। तो उन्होंने तवे रखे सातों तवों को फाड़कर लौ बाहर आ गई। तो माता जी के चमत्कार से प्रभावित होकर आज जो ऊपर पहाड़ी पर छतरी बनी है वो जहांगीर ने बनवाई है माता जी के सम्मान में चमत्कार से प्रभावित होने के बाद।”
एक और लोककथा के अनुसार, सांभर झील तब बनी थी जब शाकंभरी माता ने उस जगह पर मौजूद चांदी की एक खदान को झील में बदल दिया था। माना जाता है कि यह खदान देवी द्वारा स्थानीय शासक को दिया गया एक वरदान थी। कहा जाता है कि उन्होंने इसे झील में इसलिए बदल दिया था, ताकि इसकी धन-संपदा को लेकर लोगों के बीच कोई विवाद न हो।
भारत की सबसे बड़ी अंतर्देशीय खारे पानी की झील के बीच स्थित इस मंदिर में साल भर श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। नवरात्रि के दौरान यहां दर्शन के लिए भारी भीड़ जुटती है।