Gujarat: हो सकता है कि ये आश्रम गुजरात के साबरमती आश्रम जितना मशहूर न हो, लेकिन आजादी की लड़ाई और महात्मा गांधी की शख्सियत को आकार देने में इस आश्रम की अहम भूमिका रही है। गांधी जी के आजादी के लिए देश भर में चल रहे आंदोलन का चेहरा बनने से काफी पहले, अहमदाबाद के कोचरब इलाके की ये साधारण सी जगह भारत में उनका पहला आश्रम थी।
दक्षिण अफ्रीका से लौटने के कुछ महीनों बाद, 1915 में कोचरब में सत्याग्रह आश्रम की स्थापना हुई। यहीं पर गांधीजी ने सच्चाई, अहिंसा, सादगी और सामाजिक समानता के विचारों को अपने जीवन का हिस्सा बनाना शुरू किया। अब कोचरब के सत्याग्रह आश्रम को संभालने का बीड़ा गुजरात विद्यापीठ ने उठा रखा है। ये आश्रम भारत में गांधीजी के शुरुआती दिनों की यादें समेटे हुए है।
गुजरात विद्यापीठ वाइस चांसलर हर्षद भाई पटेल ने कहा की “पूज्य बापू जब साउथ अफ्रीका से भारत आए तो स्वदेश आने के बाद 25 मई 1915 में भारत में पहला आश्रम कोचरब गांव में कोचरब आश्रम स्थापित किया। उसका नामकरण भी सब लोगों के साथ संवाद करके सत्याग्रह आश्रम रखा। दो साल बापू और आश्रम वासी वहां पर रहे। जो भी गांधी जी के सामाजिक प्रयोग थे, समाज व्यवस्था में उनके जो व्रत थे, उसका प्रारंभ विंदु आश्रम दिनचर्या, आश्रम भजनावली – वो सारी चीजें कोचरब आश्रम में ही शुरुआत हुई। कोचरब आश्रम एक प्रारंभ विंदु है, जो मोहन से महात्मा तक की सफर का है।”))
आश्रम में एक संग्रहालय है, जिसमें महात्मा गांधी से जुड़ी तस्वीरें, कलाकृतियां और उनके निजी सामान रखे हुए हैं। नायाब सामानों में उनकी लकड़ी की लिखने वाली डेस्क और चरखा भी शामिल हैं। फिर भी इस जगह की अहमियत संग्रहालय में रखे सामानों से कहीं ज्यादा है। यहीं पर गांधीजी ने एक दलित परिवार का समुदाय में स्वागत करके सामाजिक भेदभाव को चुनौती दी थी।
इतिहासकार रिजवान कादरी ने बताया कि “इसी आश्रम में सत्याग्रह आश्रम, कोचरब एरिया है, याद रखना। कोचरब आश्रम नहीं है। ये सत्य का आश्रम है, जहां पर सिर्फ सत्य बोलना नहीं है, सत्य के लिए समर्पित है, सत्य के लिए लिए आपको जद्दोजहद करना है। और उसी के लिए आपको फना भी होना है। जब दूदा भाई दाफड़ा को उन्होंने आश्रम में प्रवेश दिया, उससे कोचरब गांव के अंदर उन्होंने अंतरजातीय शाला शेड्यूल कास्ट के बुजुर्ग लोगों के लिए शुरू कर दी थी। और दूदा भाई दाफड़ा का आना हुआ, वो तारीख थी सितंबर की 11 तारीख। महीना नौ था। उन्होंने कस्तूरबा को भी स्पष्ट शब्दों में कहा, आपको अगर इस आश्रम में रहना है तो आश्रम वासी की तरह रहना होगा। दूदा भाई, दानी बेन भी यहां रहेंगे।”
इतिहासकार मानते हैं कि कोचरब में गांधीजी ने जो समय बिताया, वो मोहनदास से महात्मा बनने की उनकी यात्रा का अहम पड़ाव था। आश्रम के अनुभवों और प्रयोगों ने उन विचारों को आकार देने की बुनियाद रखी, जिन्होंने आगे चलकर आजादी की लड़ाई में गांधी जी की भूमिका तय की।
इस इलाके में 1917 में प्लेग फैल गया। साथ ही गांधी जी को खेती-बाड़ी और दूसरे रचनात्मक कामों के लिए ज्यादा जगह की जरूरत थी। ऐसे में इस समुदाय का बसेरा साबरमती नदी के किनारे पहुंच गया। बेशक साबरमती आश्रम गांधीजी और आजादी की लड़ाई में उनकी भूमिका का पर्याय बन गया हो, लेकिन उस सफर की शुरुआत कोचरब स्थित आश्रम से ही हुई थी। दो अक्टूबर को गांधी जयंती है। लिहाजा इस आश्रम की अहमियत और प्रासंगिक हो जाती है। यहां उस दौर की झलक दिखती है, जब अहमदाबाद के छोटे से कोने में गांधीजी के सार्वजनिक जीवन की बुनियाद रखी गई थी।