UP News: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर बीजेपी ने अभी से तैयारी तेज कर दी है। पार्टी ने सभी 403 विधानसभा सीटों पर उम्मीदवारों के चयन और मौजूदा विधायकों की लोकप्रियता जांचने के लिए गुप्त महासर्वे अभियान शुरू किया है। बताया जा रहा है कि यह सर्वे निजी एजेंसियों के जरिए कराया जा रहा है।
दिल्ली और लखनऊ नेतृत्व के निर्देश पर यूपी बीजेपी ने पांच चरणों वाला विशेष सर्वे अभियान शुरू किया है। इस सर्वे में बीजेपी के कब्जे वाली सीटों के साथ-साथ विपक्ष और एनडीए सहयोगी दलों के पास मौजूद सभी विधानसभा क्षेत्रों को भी शामिल किया गया है। सर्वे एजेंसियां हर विधानसभा क्षेत्र से जनता के बीच सबसे मजबूत और लोकप्रिय तीन संभावित उम्मीदवारों का पैनल तैयार कर रही हैं। इस रिपोर्ट को बीजेपी हाईकमान तक पहुंचाया जा रहा है। सर्वे के कुछ चरणों की रिपोर्ट नेतृत्व को मिल चुकी है।
बीजेपी इस बार उम्मीदवार चयन में एंटी-इनकंबेंसी को भी बड़ा आधार बना रही है। पार्टी सूत्रों के मुताबिक, खराब प्रदर्शन और जनता से कमजोर जुड़ाव वाले मौजूदा विधायकों पर गाज गिर सकती है। रिपोर्ट के अनुसार, करीब 40 प्रतिशत मौजूदा विधायकों के टिकट में बदलाव या कटौती की संभावना जताई जा रही है।
बीजेपी का फोकस इस बार सिर्फ संगठनात्मक पकड़ पर नहीं, बल्कि जनता के बीच मजबूत छवि वाले चेहरों को आगे लाने पर है। 2027 के चुनाव से पहले यह महासर्वे पार्टी की उम्मीदवार चयन रणनीति में अहम भूमिका निभा सकता है। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 के लिए भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने सभी 403 सीटों पर उम्मीदवारों के चयन और मौजूदा विधायकों की लोकप्रियता जांचने के लिए एक विशाल गुप्त महासर्वे अभियान शुरू किया है। दिल्ली और लखनऊ शीर्ष नेतृत्व के निर्देश पर यह सर्वे पूरी तरह निजी एजेंसियों के माध्यम से जमीन पर गुप्त रूप से कराया जा रहा है।
5 चरणों का महासर्वे और रणनीति-
403 सीटों पर पैनी नजर: यह सर्वे सिर्फ बीजेपी के कब्जे वाली सीटों पर ही नहीं, बल्कि विपक्ष और एनडीए (NDA) के सहयोगी दलों के पास मौजूद सभी 403 विधानसभा क्षेत्रों में कराया जा रहा है।
5 चरणों में जांच: उम्मीदवार चयन की पारदर्शिता बढ़ाने के लिए 5 चरणों वाला विशेष सर्वे अभियान डिजाइन किया गया है, जिसमें से कुछ चरणों की रिपोर्ट नेतृत्व को मिल भी चुकी है।
एक सीट, तीन नाम: एजेंसियां हर विधानसभा क्षेत्र से सबसे मजबूत और जनता के बीच लोकप्रिय 3 संभावित प्रत्याशियों (पैनल) की सूची तैयार कर हाईकमान को सौंप रही हैं।
टिकट पक्का होने और कटने के नए मापदंड-
एंटी-इनकंबेंसी पर वार: खराब प्रदर्शन करने वाले और जनता में अलोकप्रिय हो चुके मौजूदा विधायकों के टिकट कटना तय माना जा रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, लगभग 40% मौजूदा विधायकों के टिकटों में फेरबदल या कटौती देखने को मिल सकती है ताकि नए और ऊर्जावान चेहरों को मौका मिले।
जनसेवक की छवि: इस बार सिर्फ पार्टी में रसूख काम नहीं आएगा। प्रत्याशी की छवि ‘जनसेवक’ वाली होनी चाहिए और उसका जनता के साथ सीधा व मजबूत जुड़ाव होना अनिवार्य है।
पार्टी नेतृत्व का स्पष्ट संदेश है कि विधायक की व्यक्तिगत छवि और क्षेत्र में पकड़ ही टिकट का एकमात्र पैमाना होगी। इसके लिए किसी भी तरह की गुटबाजी या सिफारिश को दरकिनार कर केवल जमीनी फीडबैक को प्राथमिकता दी जाएगी। पार्टी किसी एक एजेंसी या नेता की रिपोर्ट पर निर्भर नहीं रहना चाहती। इसलिए सर्वे को तीन स्तरों पर गुप्त रखा गया है. बता दें कि सर्वेयर सार्वजनिक स्थलों पर आम जनता से सीधे बात करेंगे और सरकार तथा स्थानीय विधायक की छवि का आकलन करेंगे। इतना ही नहीं सर्वेयर ज़िले के छोटे भाजपा पदाधिकारियों के साथ-साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के स्थानीय कार्यकर्ताओं से भी फीडबैक लेंगे। क्षेत्र के वकीलों, डॉक्टरों, शिक्षकों, युवाओं, महिलाओं, दुकानदारों और सामाजिक संगठनों से विधायक की कार्यशैली पर चर्चा होगी।
भाजपा ने 2022 के चुनाव में भी इसी तरह का एजेंसी आधारित सर्वे कराया था, जिसके आधार पर 165 सीटों पर नए चेहरों को मौका दिया गया था और 120 से अधिक विधायकों के टिकट काट दिए गए थे। इस बार भी जिन विधायकों की नेगेटिव रिपोर्ट आएगी, उनका पत्ता कटना लगभग तय माना जा रहा है। मुस्लिम बहुल इलाकों में मुफ्त राशन जैसी योजनाओं के लाभार्थियों से भी सीधा फीडबैक लिया जाएगा। भाजपा ने उन 61 विधानसभा सीटों पर अलग से विस्तृत सर्वे और डेटा कलेक्शन शुरू किया है, जहां पार्टी लगातार पिछले तीन चुनावों (2012, 2017 और 2022) में हारती आ रही है।
पूर्वी यूपी (22 सीटें): आज़मगढ़, मऊ, जौनपुर, गाज़ीपुर और मिर्ज़ापुर जैसे जिलों की कमजोर सीटों पर खास ध्यान दिया जा रहा है।
पश्चिम यूपी (13 सीटें): सहारनपुर, मुरादाबाद और बिजनौर की हारी हुई सीटों पर नए जातीय समीकरणों को साधा जा रहा है।
सहयोगी दलों की भूमिका: 2022 में इन 35 सीटों में से 27 सीटें सपा ने जीती थीं। तब रालोद और सुभासपा विपक्षी खेमे में थे, जो अब एनडीए (BJP गठबंधन) का हिस्सा हैं। भाजपा इन सीटों पर अपने नए सहयोगियों के साथ बूथ-स्तरीय रणनीति तैयार कर रही है।