नमिता बिष्ट
2 सितंबर के दिन गढ़वाली भाषा दिवस मनाया जाता है। यह दिन गढ़वाली भाषा को सम्मान दिलाने के लिए और 2 सिंतबर 1994 को मसूरी गोलीकांड में शहीद हुए आंदोलनकारियों के सम्मान में मनाया जाता है। इससे पहले 1 सितंबर को खटीमा गोलीकांड की याद में कुमाऊं दिवस मनाया जाता है। इस दिन को मनाने की पहल पर्वतीय राज्य मंच द्वारा 2018 में की गई थी तबसे हर साल 2 सिंतबर के दिन गढ़वाली भाषा दिवस मनाया जाता है।
गढ़वाली एक भाषा नहीं बोली हैं
गढ़वाली एक भाषा नहीं बोली है। कोई भी बोली जब साहित्यिक रूप ले लेती है, तो वह भाषा बन जाती है। गढ़वाली में साहित्य की लगभग सभी विधाओं में पुस्तकें छप चुकी हैं। इतना ही नहीं कई फिल्में भी बन चुकी हैं और कई पुस्तकों का गढ़वाली में अनुवाद भी हो चुका है। लेकिन यह बड़ी विड़म्बना है कि यह आज तक मात्र बोली बन कर जी रही है क्योंकि इसकी कोई आधिकारिक लिपि नही है। यह सिर्फ देवनागरी लिपि में लिखी जाती है।
देवनागरी लिपि में लिखी जाती है गढ़वाली
इंडो-आर्यन भाषा श्रेणी में गढ़वाली,ब्राह्मी भाषाओं के समूह में आती है जो अल्फासिलैबिक लिपि यानि वर्तमान की देवनागरी लिपि में लिखी जाती है। कहा जाता है कि 10वीं शताब्दी से उत्तराखंड के गढ़वाल मंडल में ये संपर्क बोली बन चुकी थी और 17वीं शताब्दी के आते-आते इसमें गढ़वाली साहित्य भी लिखा जाने लगा था। हालांकि 19 और 20वीं शताब्दी का गढ़वाली में लिपिबद्ध हुआ साहित्य ही अब आसानी से उपलब्ध है। जिसमें लोक कथाएं, लोकगीत,धार्मिक नाटक और लोक गीत प्रमुखता में है। इसी दौर में यह जन सामान्य से लेकर राजकाज की भाषा भी बनी। यहां तक गढ़वाल के राजाओं ने इसे अपनी राज भाषा बनाया।
20 वीं सदी में ऐसे पढ़ी जाती थी बारहखड़ी
20 वी शताब्दी के आरम्भ में लिखित प्रमाण में पाया गया कि ई को oo लिखा जाता था और र को न लिखते थे। ऐसे ही ख को ष लिखते थे। 20वी शताब्दी के आरम्भ तक बारह खड़ी पढ़ने का भी एक विचित्र तरीका था। बच्चे क का की को आदि न पढ़कर उसे कुछ इस तरह पढ़ते थे- बिजनकी -क, कुंदन्तु -का , बाजिमती -कि , देणे -की , उडताले -कु, बड़ेरे -कू , एकलग – के ,दोलग -कै ,लखनया – को ,दुलखनया-कौ ,श्री बिंदु -कं , दुवास बिंदु -कः।
कई क्षेत्रों में गढ़वाली का असर
गढ़वाल मंडल के सातों जिले पौड़ी, टिहरी, चमोली, रुद्रप्रयाग, उत्तरकाशी, देहरादून और हरिद्वार गढ़वाली भाषी लोगों के मुख्य क्षेत्र हैं। कुमांऊ के रामनगर क्षेत्र में गढ़वाली का असर देखा जाता है। इस पर हिन्दी के अलावा मराठी, फारसी, गुजराती, बांग्ला, पंजाबी आदि का भी प्रभाव रहा है लेकिन गढ़वाली का अपना शब्द भंडार है जो काफी विकसित है और हिन्दी जैसी भाषा को भी अपने शब्द भंडार से समृद्ध करने की क्षमता रखती है। वर्तमान में गढ़वाली की 8 उपबोलियां है।
कोस कोस पर बदले पानी, चार कोस पर वाणी
ग्रियर्सन ने गढ़वाली के कई रूप जैसे श्रीनगरी, नागपुरिया, बधाणी, सलाणी, टिहरियाली, राठी, दसौल्या, मांझ कुमैया आदि बताये थे। बाद में कुछ साहित्यकारों ने मार्च्छा, तोल्छा, जौनसारी का भी गढ़वाली का ही एक रूप माना। गढ़वाली भाषाविद डा. गोविंद चातक ने श्रीनगर और उसके आसपास बोली जाने वाली भाषा को आदर्श गढ़वाली कहा था। वैसे भी कहा गया है। बता दें कि अगस्त 2011 में गढ़वाल के तत्कालीन सांसद सतपाल महाराज ने भी संसद में गढ़वाली भाषा को सविंधान की 8वीं अनुसूची में सम्मिलित करने के लिए एक विधेयक लाये थे। यदि उनका यह प्रयास सफल हो जाता तो गढ़वाली भाषा का निसंदेह कद और सम्मान बढ़ जाता।
मातृभाषा को देना होगा सम्मान
जहां एक ओर अपने अति समृद्ध शब्द संकलन और विन्यास को लेकर गढ़वाली एक अनोखी बोली है वहीं यूनेस्को इसे आज विश्व की तेजी से लुप्त होने वाली भाषा में गिनता है। गढ़वाली उत्तराखण्ड के राज्य में बोली जाने वाली एक प्रमुख भाषा है। जो की विलुप्ती की कगार पर है। क्योंकि लोग बड़ी मात्रा मे पलायन कर रहे है इसका बड़ा कारण है रोजगार और बुनियादी जरूरतें। लेकिन यह भी समझना होगा कि मातृभाषा का सम्मान किए बिना कोई सभ्यता आगे नहीं बढ़ सकती। क्योंकि आने वाली पीढ़ी को हम अपनी संस्कृति और भाषा से वंचित रख रहे है। यदि गढ़वाली कुमाऊंनी बोली भाषा लुप्त होती है तो इसके लिए आने वाली पीढ़ीयां हमें दोष देंगी।