जानिए अमर सिंह का दिलचस्प सफर

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भारतीय राजनीति के एक दौर में खासकर नब्बे के दशक में अमर सिंह एक धूरी बनकर रहे। सपा नेता मुलायम सिंह की करीबी ही नहीं बल्कि फिल्म जगत से गहरे ताल्लुकों ने उन्हें अलग शोहरत दी। देखते ही देखते सपा के खांटी नेताओं की पंगत को पीछे कर वह तेजी से पार्टी में दूसरे नंबर के नेता कहलाए जाने लगे। जिस पार्टी में बलराम यादव,  रेवती रमण सिंह आजमखान, पारसनाथ यादव, माताप्रसाद पांडे,  शारदा अंचल जैसे तमाम बड़े खांटी समाजवादी थे, वहां अमर सिंह की तूती बोल रही थी। राजनीति परिदृश्य में उनकी उपस्थिति और उनका प्रभाव एकदम सबको चौंका रहा था। राजनीति अर्थजगत और फिल्म के ग्लैमर की दुनिया को अमर सिंह ने बखूबी साझा। भारतीय राजनीति में किसी दौर में एकाएक आकर वह जिस तरह शक्ति के केंद्र बने वह अपने आप में मिसाल है। बेशक धुर समाजवादियों ने उन्हें अपने बीच का नहीं माना, बेशक सपा नेता मुलायम सिंह के बेटे अखिलेश से भी उनका तालमेल नहीं बैठा , लेकिन समाजवादी पार्टी के एक समय वह खेवनहारों में रहे। कहा जाता था कि मुलायम सिंह यादव उनके बिना एक कदम भी नहीं चलते थे।27 जनवरी 1956 को आजमगढ़ मे जन्में अमर सिंह एक अलग तरह की शखसियत थे। युवा थे तो एच एन बहुगुणा ने उन्हें राजनीति की शुरूआत के लिए कोलकाता भेजा था। वहां उनका ज्यादा मन नहीं लगा।  वह अपने को मांजते रहे और समय के साथ उन्होंने सपाई नेता मुलायम सिंह का दामन थामा। यह नजदीकी कुछ अलग थी। जीवन शैली सोच तौर तरीके बिल्कुल अलग थे। अमर सिंह हिंदी पृषठभूमि में रचे बसे मगर आधुनिक दुनिया से भी सरोकार रखते थे। वहीं मुलायम सिंह एकदम ही समाजवादी पृष्ठभूमि और देशज शैली रहे। अमर सिंह कोलकाता के सेंट जेविर्यस अंग्रेजी स्कूल में पढ़े थे पर हिंदी में भी धाराप्रवाह बोलते थे। उनकी हर लाइन  अखबारों की हैंडिग बन जाया करती थी। जुमले मुहावरों से वह रंग भर देते थे।

पर अमर सिंह ने नेताजी को अपने प्रभाव में बखूबी समझ लिया था। एक समय अमर सिंह ही प्रेस को ब्रीफिंग करते थे। मुलायम सिंह देश का कहीं भी दौरा करते थे तो अमर सिंह जरूर साथ होते थे। निश्चित इस करीबी से ही सपा में आगे विघटन भी हुए सवाल भी उठे । लेकिन उनकी अपनी अहमियत थी कि सपा ने उन्हें महासचिव भी बनाया और राज्यसभा में भी भेजा।

सपाइयों से उनके मतभद हुए तो 2010 में सभी पदों से इस्तीफा दिया। इसके बाद मुलायम सिंह ने परिस्थितियों वश उन्हें पार्टी से निष्काषित किया दिया। आजमखान, अखिलेश जैसे नेताओं से उनकी पटरी नहीं बैठी। अमर सिंह राजनीति में विवादों में भी रहे। उप्र की राजनीति में रामपुर की राजनीतिक विरासत में उनके और आजमखान के झगडे को बहुत सुर्खियां मिली। यहीं आमजखान को जयप्रदा की चुनौती राजनीति के गलियारों में सुर्खियां पाती रही।

अमर सिंह का बच्चन परिवार से गहरा नाता रहा। ऐश्वया राय और अभिषेक बच्चन की शादी तक इस परिवार से अमर सिंह की बड़ी नजदीकियां देखी गई। लेकिन यहां भी संबंधो में खटास आयी। अमर सिंह को राजनीति में खूब जुमले सुनने को मिले हैं। मुबई के फिल्म जगत में शायद ही किसी नेता की पकड़ रही हो।

अमर सिंह खराब स्वास्थ्य के चलते पिछले कुछ सालों से सक्रिय नहीं थे। रह रह कर खबर आती रही कि वह उप्र में राजपूत बिरादरी को संगठित करने की कोशिश कर रहे हैं। इसी नाते उप्र में ठाकुर अमर सिंह के नाम से पोस्टर भी लगे। लेकिन यहां तक समय बहुत आगे निकल चुका था। जीवन के आखरी दौर में उन्होंने भाजपा के लिए अनुकूल मानी जाने वाली टिप्पणियां भी लिखी। राजनीति की शैलियां ढर्रा सब कुछ बदलता रहेगा लेकिन अमर सिंह को कई वजहों से याद किया जाता रहेगा। उनके पीछे बहुत बड़ा कुनबा नहीं था, उनके साथ जनाधार भी नहीं था, पर एक दौर में वो राजनीति की हर चर्चा हर बहस में थे और यही उनकी सफलता थी।

 

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