A book by Manik Munde

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A book by Manik Munde

जहां बैठावै तित ही बैठूं, बेचैं तो बिक जाऊं।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर, बार-बार बलि जाऊं।
मीरा कहती है, ‘ अब तो उसकी आज्ञा ही मेरा जीवन है। वह जहाँ बिठा देता है वहाँ बैठ जाती हूँ; जहाँ से उठा देता है वहाँ से उठ जाती हूँ। मेरी अपनी तरफ से कोई आग्रह नहीं।’
यह समर्पण-भाव है। जिसने यह कला आत्मसात कर ली उसे फिर कोई अड़चन नहीं है। अड़चनें आती ही इसलिए हैं कि हम उससे राजी नहीं होते। भीतर वासना उठती रहती है कि मुझे ऐसी जगह बिठओ कि ऐसा बनाओ। नहीं बन पाते तो नाराजगी पकड़ती है। नाराजगी पकड़ती है तो परमात्मा से संबंध टूट जाता है।
देह से कितना भी प्रेम करो एक दिन वह टूट ही जाती है। अदेही से किया गया प्रेम अमर है। मरने वालों से तो हम जन्मों-जन्मों से प्रेम करते आ रहे हैं लेकिन हर बार तकलीफ हुयी। प्रेम ऐसे शाश्वत से करना चाहिए जिसकी कोई मृत्यु नहीं।उसमें यह भाव होना चाहिए कि बेच दे तो बिकने को राजी हूँ। ना-नूच जरा भी नहीं।
मीरा का यह सूत्र क्रांति का सूत्र है। इसमें सब आ गया।आगे और कुछ और करने को नहीं बचता।
मीरा ने अपने जीवन से प्रमाण दिए हैं। गोपाल के लिए प्रतिष्ठा खोई,लोकलाज खोई,सम्मान खोया, घर-द्वार खोया, परिवार खोया, सब तरह के अपमान सहे।बिकी। पूरी तरह बिकी। सब गँवाया।
इस समर्पण के कारण ही मीरा उस परम पद को पहुँची जहाँ आज तक बहुत थोड़ी स्त्रियां पहुँची हैं।
⚫मीरा: भक्ति का अमिरस🌑
♦चिंतन ग्रंथ ♦माणिक मुंडे♦

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